कमबख्त इतना भी नहीं समझ पा रहे हैं कि यह राष्ट्र का सबसे बड़ा मसला है।

Jun 06, 2016

राजनीति जब मर जाती है तो उसकी जगह उन्माद ही भरता है। आज बेरोजगारी, भूख, गैर बराबरी जैसे सवाल उठते ही नहीं,। कल कारखाने, उद्योग धंधे की बात ही नहीं होती। अर्थव्यवस्था टूट चुकी है।

पूंजीपतियों के लिए इससे ज्यादा सुनहरा मौक़ा कौन देगा। खरबों कमाने वाले धनपशु किसी एक सड़क पर कुछ हजार खर्च कर एक मंदिर बना देंगे। कांवड़ियों के लिए पानी पिलाने का इंतजाम कर देंगे और मथुरा की जमीन तैयार होती रहेगी।

बुद्धिविलासी डिब्बे के सामने बैठ कर निर्णय देंगे – यह केंद्र का नहीं राज्य का मसला है।

कमबख्त इतना भी नहीं समझ पा रहे हैं कि यह राष्ट्र का सबसे बड़ा मसला है।

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आस्था और तर्क के बीच अगर अंधी आस्था को उपजाओगे तो वह समाज बाबाओं के शोषण को ही बढ़ावा देगा। इसका हल केवल राजनीति है उसे सीधा करो। मथुरा एक छोटी कड़ी है, आगे भी कुछ देखना बाकी है क्योंकि मथुरा पूरा देश बन चुका है।

-चंचल
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चित्रकार व समाजवादी आंदोलन के कर्णधार हैं, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष रहे, रेल मंत्रालय के सलाहकार भी रहे हैं)

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