कोर्ट के एक अहम फैसले से उलझ सकते है तलवार दंपति

Mar 26, 2016

परिवार के सदस्यों की मौजूदगी में घर की चारदीवारी के अंदर हत्या की वारदात कैसे हुई, अभियोजन के साथ-साथ वारदात के समय मौजूद घरवालों की भी वारदात की वजह बताने की जिम्मेदारी है.

अगर परिवार के सदस्य रिहायशी मकान के अंदर हुई वारदात का कारण नहीं बताते तो उनकी चुप्पी का मतलब होगा, उनके अपराध में शामिल होने का ठोस सबूत.
सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला पिता की हत्या के मुजरिम बेटे को उम्र कैद की सजा देते हुए दिया लेकिन शीर्ष अदालत का यह महत्वपूर्ण निर्णय देश की सर्वाधिक चर्चित ‘ मर्डर मिस्ट्री’ आरुषि-हेमराज हत्याकांड के लिए नजीर बन सकता है.

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र के अकोला जिले में 14 साल पहले हुई हत्या के मुजरिम गजानन दशरथ कराटे को उसके पिता का खून करने का दोषी करार दिया. अगर इस केस के तथ्यों पर गौर करें तो यह नोएडा के आरुषि-हेमराज के दोहरे हत्याकांड से काफी मिलते-जुलते हैं. मृतक दशरथ के चचेरे भाई नागाराव ने आठ अप्रैल, 2002 को स्थानीय पुलिस को हत्या की सूचना दी. उसके पड़ोस में रहने वाले एक व्यक्ति ने उसे आकर बताया कि दशरथ अपने घर में लहुलुहान पड़ा है. डेडबॉडी के पास रक्तरंजित पत्थर भी पड़ा है. पुलिस ने मृतक के बेटे गजानन को गिरफ्तार किया. नागाराव ने पुलिस को बताया कि बाप-बेटे के बीच झगड़ा कोई नई बात नहीं थी. बेटा गजानन शराबी-जुआरी है.

अपनी बुरी आदतों की वजह से वह आए दिन पिता से पैसे मांगता था. वारदात की रात भी दोनों के बीच झगड़ा हुआ. लेकिन यह रात बाकी दिनों से कुछ अलग थी. देर रात तक दर्द से कराहने की आवाज आती रही. सुबह होते ही रामाराव का शक हकीकत में बदल गया जब उसके पड़ोसी ने बताया कि दशरथ अपने घर में मृत पड़ा है.  पुलिस ने खूनी बेटे की गिरफ्तारी के बाद उसकी निशानदेही पर उसके कपड़े भी बरामद किए. कपड़ों पर मृतक के खून के निशान पाए गए. पुलिस के सामने तो गजानन ने हत्या कबूल कर ली लेकिन अदालत में वह मुकर गया. उसने कहा कि उसे झूठे फंसाया गया है.

 

चीफ जस्टिस तीरथ सिंह ठाकुर और जस्टिस आर भानुमति की बेंच ने अपने फैसले में सीआरपीसी की धारा 106 का हवाला दिया. बेंच ने कहा कि मृतक की पत्नी वारदात के दिन समीप के गांव गई हुई थी. मृतक और उसका बेटा ही घर में था. अभियोजन यह साबित करने में सफल रहा है कि वारदात के समय अभियुक्त घर में ही था. इस कारण बेटे की जिम्मेदारी है कि वह बताए कि उसके घर में रहते वारदात कैसे हुई. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि घर की चारदीवारी के अंदर रहस्यमय परिस्थितियों में हुई हत्या को साबित करने की प्राथमिक जिम्मेदारी पुलिस की है.

लेकिन पुलिस ने अगर शुरुआती जिम्मेदारी निभाने में सफलता पा ली है तो उसके बाद घर में मौजूद परिवार के सदस्य को बताना होगा कि आखिर उसके घर में रहते हुए अपराध को अंजाम कैसे दिया गया. परिवार के सदस्य चुप्पी साधकर या अभियोजन पर जिम्मा मढ़कर अपनी जिम्मेदारी से पीछा नहीं छुड़ा सकते. अगर वह अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता तो वारदात में शामिल होने का उसके खिलाफ यह बहुत ठोस सबूत है. वारदात के बारे में संतोषजनक सफाई पेश न करने से साफ है कि हत्या उसी ने की. पुलिस ने रक्तरंजित कपड़े और पिता को प्रताड़ित करने के सबूत जुटाकर पुख्ता सबूत पेश करने में कामयाबी हासिल कर ली थी.

सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और बंबई हाईकोर्ट के नागपुर बेंच के फैसले पर अपनी मुहर लगा दी.
गौरतलब है कि नवंबर 2013 में गाजियाबाद की ट्रायल कोर्ट ने आरुषि-हेमराज हत्याकांड में तलवार दंपति को उम्र कैद की सजा सुनाते हुए सीआरपीसी की धारा 106 का सहारा लिया था. सुप्रीम कोर्ट के इस अहम फैसले से तलवार दंपति की मुश्किलें बढ़ सकती हैं. डा. राजेश और नूपुर तलवार इस समय जेल में हैं. उनकी अपील इलाहाबाद हाई कोर्ट में पेंडिंग है.

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