‘बैंकों में नए फंसे कर्जो की रफ्तार धीमी पड़ी, कई बैंकों का बुरा वक्त खत्म’

Aug 25, 2016
‘बैंकों में नए फंसे कर्जो की रफ्तार धीमी पड़ी, कई बैंकों का बुरा वक्त खत्म’
डिप्टी गवर्नर एस.एस. मुंद्र ने कहा कि बैंकों के कर्ज नए एनपीए यानि फंसे कर्ज बदलने की रफ्तार कम हुई है।

नई दिल्ली, प्रेट्र। भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर एस. एस. मुंद्रा ने कहा है कि बैंकों के कर्ज नए एनपीए यानी फंसे कर्ज में बदलने की रफ्तार तो कम हुई है लेकिन चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में कुछ बैंकों द्वारा फंसे कर्जो के लिए ज्यादा राशि का प्रावधान किये जाने के कारण उन्हें भारी घाटा हुआ है।

यहां एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि ज्यादातर बैंकों के पास पर्याप्त पूंजी है। सरकार ने जरूरत पड़ने पर और ज्यादा पूंजी देने का वायदा किया है। पूंजी की किल्लत से परेशान बैंकों को पिछले साल सरकार ने 22915 करोड़ रुपये देने की घोषणा की थी। यह पूंजी भारतीय स्टेट बैंक और इंडियन ओवरसीज बैंक समेत कुल 13 सार्वजनिक बैंकों को मिलेगी।

फंसे कर्जो की चर्चा करते हुए मुंद्रा ने कहा कि इसकी रफ्तार में मिलाजुला रुख दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि जब वह बैंकों के अलग-अलग नतीजों पर नजर डालते हैं तो ऐसे कई बैंक दिखाई देते हैं जिनके मामले में फंसे कर्जो का बुरा वक्त गुजर चुका है। लेकिन कुछ अन्य बैंकों के मामलों में ऐसा नहीं है। वे अभी भी फंसे कर्जो के दलदल में फंसे हैं। उन्हें इससे बाहर आने के लिए अभी काफी कुछ करना है।

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मुंद्रा ने कहा कि यह सोचना बेकार है कि कोई भी नया कर्ज एनपीए नहीं होगा। लेकिन नया कर्ज एनपीए बनने की रफ्तार में कमी अवश्य आई है। वर्ष 2015-16 के अंत तक बैंकों के कुल फंसे कर्ज कुल कर्जो के मुकाबले 9.32 फीसद (4.76 लाख करोड़ रुपये) हो गया जबकि पिछले वित्त वर्ष 2014-15 की समाप्ति में यह 5.43 फीसद (2.67 लाख करोड़ रुपये) था। रिजर्व बैंक की ताजा वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट के अनुसार मार्च 2017 तक बैंकों का एनपीए बढ़कर 10.1 फीसद तक पहुंच सकता है।

पटेल की नियुक्ति से नीतियों में निरंतरता रहेगी

नई दिल्ली। आरबीआइ के डिप्टी गवर्नर एस. एस. मुंद्रा ने कहा कि आरबीआइ के 24वें गवर्नर के रूप में उर्जित पटेल की नियुक्ति से नीतियों में निरंतरता बनी रहेगी। डिप्टी गवर्नर के तौर पर पटेल मौद्रिक नीति विभाग का ही कार्यभार संभाल रहे थे। गवर्नर के रूप में पटेल जब काम संभालेंगे तो आरबीआइ उनके लिए नया नहीं होगा। महंगाई और ब्याज दर से संबंधित मसलों में अभी भी उनकी मुख्य भूमिका है।

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