बुंदेलखंडः राजवारा गांव की शकुन 12 साल से फांक रही हैं मिट्टी

May 10, 2016
लखनऊ/बुंदेलखंड: में उम्‍मीद से कहीं ज्‍यादा बुरे हालात हैं। सब जगह सूखा तो है ही, इस रि‍पोर्ट को पढ़कर उम्‍मीद भी सूखने लगती है। कोई कैसे मि‍ट्टी खाकर जिंदा रह सकता है, उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्‍या यही दुनि‍या हमने बनाई है, अगर हां तो क्‍यों बनाई है…
मशहूर लोकगीत ‘चोला माटी के हो राम…’ लिखने वाले कवि ने भी नहीं सोचा होगा कि मिट्टी की यह देह जब मिट्टी में मिल जाएगी, तो उसके भीतर से मिट्टी ही मिट्टी बरामद होगी। बुंदेलखंड के ललितपुर जिले के राजवारा गांव की आदिवासी महिला शकुन की देह तो अब तक जिंदा है, अलबत्‍ता उसके भीतर इस रह-रह कर यह धरती अंगड़ाई लेती रहती है। उसका पेट पत्‍थर हो गया है। उसका दिल पत्‍थर हो गया है। उसके पथरीले चेहरे पर रह-रह कर उभर आता दर्द इस बात की सर्द गवाही दे रहा है कि बुंदेलखंड वैसे तो सूखे से जूझ रहा है, लेकिन यहां भूख का सवाल फिलहाल उससे कहीं ज्‍यादा बड़ा है।
ललितपुर में सहरिया आदिवासियों की साठ फीसदी आबादी अब तक पलायन कर चुकी है। गांव के गांव खाली हो चुके हैं। घरों में ताला लटका है। जो बचे हैं, उनके पीछे न तो कुदरत की मेहर है और न ही राज्‍याश्रय। ये धरती के असली लाल हैं जो उसी सूखी धरती पर आश्रित हैं जो उन्‍हें दो जून की रोटी तक नहीं दे पा रही। रोटी नहीं तो क्‍या हुआ, मिट्टी ही सही। बारह साल से मिट्टी फांक कर खुद को एक जिंदा गठरी में तब्‍दील कर चुकी शकुन रायकवार की कहानी खेतों-गांवों से बने इस समाज, लोकतंत्र और राष्‍ट्र के नाम पर ऐसी शर्मिंदगी है जिसे मिटा पाना किसी के वश में नहीं।
राजवारा गांव आबादी के लिहाज से काफी बड़ा है। यहां पंडितों का एक अलग टोला है। पिछड़ी जातियां आबादी में मिश्रित हैं लेकिन सहरिया आदिवासियों की बस्‍ती बिलकुल अलग बसी हुई है। इसी बस्‍ती में शकुन रायकवार नाम की विधवा रहती हैं। इनके पास बरसों से खाने को कुछ भी नहीं है। इनके दो बच्‍चे हैं। पति पांच बरस पहले गुज़र चुके हैं। हम जब इनके घर पहुंचे, तो वे किसी के घर पानी पीने गई हुई थीं। आते ही ज़मीन पर बैठक कर अपना पेट उघाड़ कर दिखाने लगीं। पेट पत्‍थर की गठरी बन चुका है।
स्‍थानीय निवासी सुनील शर्मा बताते हैं, ‘ये बारह साल से मिट्टी खा रही है।’ उसी गांव के रहने वाले रसूखदार नौजवान आशीष दीक्षित कहते हैं, ‘कभी हमारे यहां तो कभी कहीं और से इसे दाना-पानी मिल जाता है। अब तक गांव वाले ही इसे देते आए हैं। जब कुछ नहीं होता तो ये मिट्टी खा लेती है।’
शकुन के दोनों बच्‍चों का कोई अता-पता नहीं है। वे भी गांव से मांगकर खा रहे हैं और जिंदा हैं। दिक्‍कत यह है कि समूचे सहरिया समुदाय की हालत भी कोई ऐसी नहीं कि समुदाय इस महिला को मिलकर पाल सके। एक सहरिया युवक बगल की मड़ई पर खरोंचों के निशान दिखाते हुए कहते हैं, ‘ये सारी मिट्टी इसने नोच-नोच कर खा ली।’
शकुन के पास सामाजिक योजनाओं का कोई कार्ड नहीं है। वह अपनी बोली में बताती हैं, ‘हमसे न पानी भरा जाता है, न कोई काम होता है। पेट में बहुत दर्द होता है। बार-बार टट्टी जाना पड़ता है। एक रोटी भी हज़म नहीं होती।’
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