बुन्देलखण्ड में भूख, प्यास से मरती गायें एवं जंगली जानवर: (डॉ.) योगेन्द्र यादव

Jun 04, 2016

पिछले सात सालों से सूखे की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश बुंदेलखंड में पीने की पानी की तो समस्या नहीं है. इस क्षेत्र के तमाम तालाब सूख जरूर गये हैं, लेकिन भूगर्भ जल अब भी उनका साथ दे रहा है. पानी का अधिक दबाव होने के बावजूद भी यहाँ के अधिकाँश कुओं में पानी है, पानी की मात्रा में निरंतर कमी भी महसूस हो रही है. कुछ कुओं में पानी तलहटी को छू गया है. किन्तु दूसरे दिन रात भर में रिस कर इतना पानी जरूर इकठ्ठा हो जाता है, जिससे लोगों की जरूरतें पूरी हो जाए. इसके अतिरिक्त उत्तर प्रदेश सरकार ने टैंकरों से पानी सप्लाई की इतनी बेहतर व्यवस्था क इही, जिसके कारण हर जिन गांवों में पानी का संकट है, वहां तीन से चार बात टैंकर पहुँच रहा है. इस तरह से केवल मनुष्य की प्यास बुझाने के लिए ही नहीं, बल्कि उनकी अन्य जरूरतें बिना किसी बाधा के पूरी हो रही है. कई गांवों में पानी का अपव्यय भी हो रहा है. मैंने कई लोगों को जब इस तरह करने को रोका, लेकिन वे नहीं माने.
पानी और चारे का सबसे बड़ा संकट बुंदेलखंड की प्रमुख समस्या है. तालाब सूख चुके हैं. नदियों में पानी नहीं है. चारे का अभाव चरम पर है. खेतों और मैदानों के तिनके-तिनके को जानवरों ने ढूढ़-ढूढ़ कर खा लिया है. अब कुछ नहीं बचा है. कुछ पेड़ों पर जरूर पत्तियां दिखाई पडती हैं. लेकिन बकरी पालन बाहुल्य क्षेत्र होने के कारण लोग लग्गियों से तोड़-तोड़ कर इन पत्तियों को भी अपनी बकरियों को खिला दे रहे हैं. मैंने गायों को काँटों के बीच से बबूल की छोटी-छोटी पत्तियों को खाते देखा. उनकी जबान में कांटे भी चुभते रहते हैं. पहली बार दर्द पर भूख को हावी होते देखा. गायों को लोग सुबह खेतों की तरफ पानी पिला कर छोड़ देते हैं. चारे की तलाश में ये गायें दूर निकल जाती हैं, जब प्यास लगती है, तो व्याकुल होकर इधर-इधर भटकती हैं, लेकिन पानी उन्हें नही मिल पाता है, जिसके कारण वे तड़फ-तड़फ कर दम तोड़ देती हैं. मुझे इस यात्रा में कोई ऐसा गाँव नही मिला, जिस गाँव में सैकड़ों गायों के मरने की सूचना नहीं मिली हो.
महोबा जिले के तीसरे सबसे बड़े गाँव मुढारी गाँव में करीब तीन हजार गायें है. जिनमे से करीब 500 गायों ने दम तोड़ दिया है. इसी गाँव में करीब 250 भैंसे और करीब 300 बैलों में भी दम तोड़ दिया है. इसके आलावा इस गाँव के आस-पास जो जगंल हैं, उनमें करीब 40 नीलगाय, 150 मोर, और पानी के लिए कुएं कूदे 5 बन्दर भी कूद पड़े, प्यास तो शायद उनकी बुझ गयी होगी, लेकिन न निकल पाने के कारण उन सभी ने उस कुएं में ही दम तोड़ दिया. इसके बाद मैंने नत्थू का डेरा गाँव का दौरा किया. इस गाँव में केवल 15 घर हैं. लोगों ने मरने के पहले ही गाय और भैस बेच दी थी. एक गाय को हमने मौत के मुह में जाते देखा. उस गाय के चेहरे का रंग उड़ गया था. आँखें लगभग बंद हो रही थी. मल और मूत्र त्याग पर उसका नियंत्रण समाप्त हो चुका था. लोगों से बात करने पर पता चला कि भूख और प्यास के कारण ही इस गाय की यह दशा हुई है. एक दो दिनों में मर जायेगी. इसके बाद मैं रावतपुरा खुर्द की ओर जा रहा था, तभी रास्ते में एक मरी हुई गाय हमें दिखी. जब गाँव वालों से पूछा, तो लोगों ने बताया कि पिछली रात ही भूख और प्यास से वह मर गयी. मैंने जब उस गाँव में निवासियों से पूछा कि 1 मई से लेकर अभी तक कितनी गायें इस तरह मरी, तो लोगों ने बताया कि पिछले डेढ़ महीने में करीब 50 गायें भूख और प्यास से मर गयी. इसके आलावा इस गाँव में कुएं में गिर कर एक मोर के मरने की भी जानकारी गाँव वालों ने दी. उन्होंने बताया कि प्यास से व्याकुल मोर कुएं में उतरा, और फिर वापस उससे नही निकल सका. इसी प्रकार वहां के जंगलों में एक दर्जन से अधिक नील गाय के मरने की भी सूचना उस गाँव वालों दी, और यह भी बताया कि हर हफ्ते दो-चार बन्दर प्यास से व्याकुल होकर पानी पीने के लिए कुएं में उतर जाते है, कुएं गहरे होने के कारण वे बाहर नही निकल पाते और उसी में तड़फ-तड़फ कर मर जाते हैं. इसके बाद मैं जल हल यात्रा पहुचने के पहले ही करहरा डांग पहुंचा. इस सम्बन्ध में वहां के लोगों से गाय के मरने के बारे में तहकीकात की, तो पता चला कि अभी तक उस गाँव में भूख और प्यास से करीब 20 गायें मर गयी हैं. पानी पीने के लिए कुएं में उतरे चार बंदरों के मरने की भी सूचना उस गाँव के लोगों ने मुझे दी. इसके बाद मैं खोनारिया गाँव पहुंचा, वहां के लोगों से बात की, तो पता चला कि इस गाँव में एक-दो गाय रोज मर रही है. और अब तक करीब 100 गायें मर चुकी हैं. दो भैसों के मरने की सूचना भी गाँव वालों ने दी. इसके बाद मैं गुर्जा खुड़े पहुंचा इस गाँव वालों ने बताया कि अभी तक हमारे यहाँ केवल दो गायें ही मरी, जो चरते-चरते बहुत दूर निकल गयी थी, जब प्यास से व्याकुल हुई, तो पानी की तलास में इधर-उधर भटकने लगी, और घर पहुचने के पहले ही दम तोड़ दिया. इस गाँव के लोगों से विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करने के बाद मैं कमालपुरा पहुंचा. वाहन के लोगों ने बताया कि अभी तक इस गाँव में करीब 10 गायें और 3 भैसे मर गयी. यहाँ के बाद हम पचपहरा पहुचे. वहां के लोगों से चर्चा करने के बाद पता चला कि अभी तक इस गाँव में 15 गायें मर गयी. जब मैंने जंगली जानवरों के मरने के बारे में तहकीकाकात की, तो पता चला कि दो वनगायें भी मरी हुई देखी गयी हैं. एक तो कुएं में गिर कर मर गयी और दूसरी पहाड़ पर मरी पड़ी है. अंत में मैं अपनी टीम के साथ ग्राम चांदो पंहुचा. वहां के निवासियों से जब मैंने बात की, तो पता चला कि अभी तक उस गाँव में करीब 50 गायें, 10 भैसे और 12 बकरियां मरी हैं.
पिछले सात सालों से सूखे की मार झेल रहे उत्तर प्रदेश बुंदेलखंड की स्थिति बेहद खराब है. इसके आलावा इन गाँव वालों की लापरवाही भी है. मुझे कोई ऐसा गाँव नही मिला, जहाँ अखिलेश सरकार ने पीने के पानी व्यवस्था न की हो, लेकिन गाँव वाले दूध न देने वाली गायों को पानी पिला कर चरने के लिए छोड़ देते हैं. चारे की तलाश में ये गायें इतनी दूर निकल जाती हैं कि प्यास लगने पर वापस घर नहीं लौट पाती हैं, और रास्ते, खेत, जंगल में दम तोड़ देती हैं. यदि इस क्षेत्र के लोग थोड़े जागरूक हो जाएँ, गोमाता का भाव उनके अन्दर आ जाए, तो इतनी संख्या में गायें न मरें. जल संकट जंगली जानवरों के सामने है. उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री ने सभी जंगलों में दर्जनों तालाब खुदवा दिए हैं, लेकिन बिना बारिश के उसमें पानी नही भरा जा सकता है. जो तालाब पहले से हैं, वे सूखे हुए हैं, उनमे पानी की एक बूँद भी नही है. इसी कारण वे प्यास से मर रहे हैं. मैंने गाँव वालों से जब इस सम्बन्ध में बात की, तो उन्होंने बताया कि वे चाहते हैं कि जंगली जानवरों के लिए पानी की व्यवस्था कर दें, पर जंगली जानवर बस्ती की तरफ आते ही नही है. इसके बावजूद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री को इसे प्राथमिकता के साथ लेकर जंगली जानवरों के लिए पीने के पानी की व्यवस्था कैसे की जा सकती है, इस पर विचार करना चाहिए.
प्रो. (डॉ.) योगेन्द्र यादव
विश्लेषक, भाषाविद, वरिष्ठ गाँधीवादी-समाजवादी चिंतक, पत्रकार व्
इंटरनेशनल को-ऑर्डिनेटर – महात्मा गाँधी पीस एंड रिसर्च सेंटर घाना, दक्षिण अफ्रीका

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