क्यों महसूस करने लगे आलोचना को अपमान भाजपा नेता !

May 19, 2016

हमारे देश के लोकतंत्र को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने का खिताब हासिल है। असल में लोकतंत्र का मतलब ही बन्धनों से मुक्त चेतना से है जिसमे आप सत्ताधारियों के विचारों के प्रति असहमति भी दर्ज करा सकतें हैं और उनकी नीतियों की आलोचना का भी आपको पूरा हक होता है एक आम भारतीय नागरिक होने के नाते। असल में यही लोकतंत्र की खूबसूरती है। लेकिन विडंबना यह है कि अब तमाम राजनैतिक दलों द्वारा लोकतंत्र के मायने और विशेषताओं को सीमित करने की कवायद की जा रही है। उनकी नज़र में लोकतंत्र अब सिर्फ चुनावी व्यवस्था भर है जिसके ज़रिए जनता उनको सत्ता तक पहुंचाती। बस इसके बाद लोकतंत्र का कोई मायने नहीं रह जाते इनकी नज़र में। न असहमति का अधिकार न आलोचना की गुंजाइश। सब खत्म सत्ता में आने के बाद।

कुछ ऐसा ही हाल है भारतीय जनता पार्टी का। अब ऐसा लगने लगा है कि चुनाव की लोकतांत्रिक प्रक्रिया के ज़रिए सत्तासीन होने के बाद इसके नेता को लोकतंत्र की खूबियों और अधिकारों को भुला चुके हैं। जनता ने वोट देकर अपना काम पूरा किया अब देश को कैसे चलाना है इसका फैसला सरकार का मुखिया करेगा। उसका फैसला गलत हो या सही। न आपको उसकी आलोचना करने का अधिकार है न ही उसकी समीक्षा करने का। असहमति तो आप रख ही नहीं सकते सरकार की नीतियों से। लब्बोलुआब यह मान लीजिए की इनके लिए का लोकतंत्र चुनाव तक ही था। अब सत्तासीन होने के बाद लोकतंत्र की कोई प्रासंगिकता नहीं बचती। कम से कम भाजपा के राज्यसभा सांसद विजय गोयल के सौजन्य से लगा यह पोस्टर तो इसी ओर इशारा कर रहा है।

यह एक गंभीर प्रश्न है कि मौजूदा दौर में आलोचना को लोगों ने व्यक्तिगत सम्मान से क्यों जोड़ दिया है। असल में अब आलोचना को लोगों ने गलत अर्थों में सोचना-समझना शुरू कर दिया है। आलोचना करना बुराई करना बिलकुल भी नहीं है बल्कि इसके ज़रिए तो गलतियों को सुधार आने की सम्भावना पैदा होती है। आलोचना तो सुधार का महज़ एक जरिया भर है ताकि गलतियों में सुधार कर अंधेरों को रौशनी से भरा जाए। लेकिन दुर्भाग्य है कि आज लोगों ने आलोचना को गलत अर्थों में समझना शुरू कर दिया है जिससे उनके सम्मान में कमी आती है।

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