मप्र,छग व गुजरात सहित देश के आधे से ज्यादा राज्य चाहते है नहरों से तौबा

Jul 14, 2016

मप्र,छग व गुजरात सहित देश के आधे से ज्यादा राज्य चाहते है नहरों से तौबा

अरविंद पांडेय। नईदिल्ली। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ और गुजरात सहित देश के आधे से ज्यादा राज्य अब नहरों से तौबा चाहते हैं। वजह पानी की बढ़ती किल्लत और पहले के मुकाबले भूमि अधिग्रहण को लेकर बढ़ी दिक्कतें। यही वजह है कि इन सभी राज्यों ने किसानों के खेतों तक पानी पहुंचाने के लिए नहरों की जगह पानी की पाइप लाइनों में रूचि दिखाई है।

हालांकि राज्यों की मानें तो यह प्लान नहरों के मुकाबले थोड़ा मंहगा होगा,लेकिन नहरों के जरिए पानी की जो बर्वादी होती है,साथ ही भूमि अधिग्रहण को लेकर जो दिक्कतें सामनें आती है, उन सबसे बचा जा सकेगा। राज्यों की यह रूचि उस समय सामने आयी है, जब नीति आयोग ने इस मुद्दे पर इन दिनों देश के तमाम राज्यों से चर्चा कर रहा है।

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इस दौरान जो रोचक जानकारी सामने आई है,उसके मुताबिक देश के ज्यादातर राज्यों ने माना कि अब नहरों की जगह पानी की अंडरग्राउड पाइप डालना ज्यादा मुफीद है। इनमें मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और गुजरात जैसे राज्यों ने इसकी सबसे ज्यादा तरफदारी की है। आयोग से जुड़े सूत्रों की मानें तो आयोग ने राज्यों की इस रूचि को देखते हुए इसे लेकर प्लानिंग शुरू कर दी है। साथ ही बाकी राज्यों से भी बातचीत की जा रही है।

बता दें कि नीति आयोग ने सिंचाई के लिए नहरों की जगह अंडरग्राउड पानी की पाइप लाइनों के विकल्प पर काम तब शुरू किया है,जब गर्मी के दिनों में कई राज्यों में सूखे की विकराल स्थिति बन गई थी। पीने के पानी तक की समस्या हो गई है। किसानों की फसलें तो पानी के आभाव में सूख ही गई थी। ज्यादातर राज्यों के जल भंडार भी खाली हो गए थे या निम्नस्तर पर आ गए थे।

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नीति आयोग क्यों दिखा रहा है रूचि?

नीति आयोग की मानें तो नहरों की जगह सिंचाई के लिए पानी की अंडरग्राउड पाइप लाइनों को डालने की बात उस समय आगे बढ़ी, जब देश के कई हिस्सों में भूमि अधिग्रहण न होने पाने के चलते नहरों का निर्माण अटका हुआ है। बड़ी संख्या में मामले में न्यायालय में लंबित है। इसके चलते प्रोजेक्ट की लागत बढ़ गई। किसानों को तय समय में इसका लाभ नहीं मिल पा रहा था।,जैसे तमाम मुद्दे थे।

यह होगा फायदा

नीति आयोग से जुड़े रणनीतिकारों की मानें तो नहरों की जगह अंडरग्राउड पानी की पाइप लाइन डलने से तीन मुख्य फायदे होंगे-

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-नहरों में अभी जो पानी छोड़ा जाता है,उसका 40 फीसदी हिस्सा ही खेतों तक पहुंच पाता है। बाकी रास्ते में बर्वाद हो जाता है। जो पाइप लाइनों के डलने से काफी बचेगा।यानि खेतों तक 80 फीसदी पानी पहुंचने लगेगा।

-भूमि अधिग्रहण की समस्या खत्म हो जाएगी। नहरों के निर्माण में अभी यह सबसे बड़ी चुनौती है। विदेशों में भी खेतों तक पानी की सप्लाई पाइप लाइनों के जरिए होता है।

-भूमि की बर्वादी रूकेगी। नहरों के बनने से उसके आसपास का एक बड़ा हिस्सा सीपेज के चलते खराब हो जाता है। जो पाइप लाइनों के डल जाने से खत्म हो जाएगा।

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