मौत को मात देने अकेले जूझ रही ‘बेटी’, दोनों किडनी हुईं खराब

Aug 11, 2016

मौत को मात देने अकेले जूझ रही ‘बेटी’, दोनों किडनी हुईं खराब

भोपाल। राजीव सोनी। तृप्ति पारखे संघर्ष और जीवटता की जीती-जागती मिसाल है। आठ साल पहले मां-बाप नहीं रहे। घर में फाके…ऊपर से दोनों किडनी खराब। फिर भी हिम्मत नहीं हारी। डायलिसिस टेक्निशियन का डिप्लोमा किया। राजधानी के एक निजी अस्पताल में नौकरी करने लगी, ताकि डायलिसिस और जीवन-यापन हो सके। उनकी जिंदगी एक किडनी की मोहताज है। मुंबई का अस्पताल उसे ‘किडनी’ देने को तैयार भी है, लेकिन ऑपरेशन का खर्च आड़े आ रहा है।

28 वर्षीय भोपाल की तृप्ति ने अपने आत्मबल और खुद्दारी से न केवल जीवन की राह निकाली, बल्कि प्रेरणा की मिसाल भी बन रही हैं। हर दिन मौत से साक्षात्कार, जितने दिन डायलिसिस…बस तब तक ही सांस चल रही है। किडनी ट्रांसप्लांट ही इकलौता स्थायी इलाज है।

नहीं छोड़ी उम्मीद… कोई रिश्तेदार ऐसा नहीं जो किडनी ‘डोनेट’ कर सके। एकमात्र उम्मीद ‘कैडिबर ट्रांसप्लांटेशन’ (ब्रेन डेड अथवा हादसे के शिकार लोगों के अंगदान) पर टिकी है। मुंबई के जसलोक अस्पताल से दो बार उसे ‘कॉल’ आ चुका है, लेकिन ऑपरेशन का खर्च 8-9 लाख है। इतनी बड़ी रकम उनके बूते के बाहर है। लेकिन तृप्ति ने उम्मीद नहीं छोड़ी।

कहती है ईश्वर कुछ न कुछ इंतजाम जरूर करेंगे। हफ्ते में दो डायलिसिस तृप्ति की जिजीविषा और खुद्दारी से प्रभावित होकर भोपाल के नेफ्रोलॉजिस्ट डॉ. हनैद एफ कागलवाला ने उसकी मदद के लिए हाथ बढ़ाया। अस्पताल प्रबंधन से हफ्ते में दो बार डायलिसिस मुफ्त करा दिया।

साथ ही उसकी ड्यूटी डायलिसिस यूनिट में ही लगा दी, जिससे वह अपने साथ मरीजों और मशीनों का भी ख्याल रख सके। हर माह मिलने वाले दस हजार रुपए से उसकी दाल-रोटी और जीवन का संघर्ष आसान तो हो गया, लेकिन अब किडनी ट्रांसप्लांटेशन के बिना प्राणों का संकट टला नहीं।

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