ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण कार्यकर्ता से किया गया वादा नमो के मित्र अडानी को भारी पड़ सकता है

Jun 06, 2016

ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री मैल्कम टर्नबुल की भेंट शुक्रवार को चुनाव प्रचार के दौरान ‘नीमो’ से हो गई. हम मशहूूर एनीमेशन फिल्म ‘फाइंडिंग नीमो’ के मुख्य पात्र की बात नहीं कर रहे. बल्कि एक ऑस्ट्रेलियाई पर्यावरण कार्यकर्ता ने नीमो की पोशाक पहनकर आस्ट्रेलियाई पीएम से मुलाकात की.

ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने जब इस कार्यकर्ता के संग सेल्फी खिंचाने की इच्छा जाहिर की तो उसने मना कर दिया. इस नीमो ने सेल्फी के लिए पीएम के सामने एक अलहदा शर्त रखी.

पर्यावरण प्रेमी नीमो ने पीएम से कहा कि वो तभी सेल्फी खिंचवाएगा जब वो उससे वादा करेंगे कि भारतीय कारोबारी गौतम अडानी की क्वींसलैंड स्थित 12 अरब डॉलर की कोयला खदान परियोजना को सार्वजनिक फंड से मदद नहीं दी जाएगी.

इसके बाद ऑस्ट्रेलियाई पीएम ने नीमो से वादा किया कि “अडानी को सार्वजनिक फंड नहीं दिया जाएगा.” इसके बाद नीमो और पीएम ने सेल्फी ली.

अगर ऑस्ट्रेलियाई पीएम अपना वादा निभाते हैं तो अडानी की ये कोयला खदान परियोजना मुश्किल में पड़ जाएगी.

नमो के साथ सेल्फी

अब आप दो साल पहले ली गई एक सेल्फी को याद करें. नवंबर, 2014 को भारतीय पीएम नरेंद्र मोदी ने तत्कालीन ऑस्ट्रेलिया पीएम टोनी एबॉट के संग सेल्फी ली थी. कारोबारी अडानी को पीएम मोदी का करीबी माना जाता है.

पीएम मोदी के उस दौरे के समय ही अडानी की क्वींसलैंड स्थित कोयला परियोजना को हरी झंडी मिली थी.

जब अडानी को अपने प्रोजेक्ट के लिए निवेशक नहीं मिल रहे थे तब भारतीय स्टेट बैंक(एसबीआई) ने उसे एक अरब डॉलर का लोन दिया. ये घोषणा भी मोदी के ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान ही की गई.

मोदी के साथ ऑस्ट्रेलिया गए प्रतिनिधि मंडल में गौतम अडानी और एसबीआई की चेयरपर्सन अरुंधति भट्टाचार्य शामिल थीं.

अडानी की निराशा

ऐसा लगता है कि अडानी ने पहले ही इस प्रोजेक्ट का भविष्य भांप लिया था. ऑस्ट्रेलियाई मीडिया को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने इस परियोजना में पर्यावरण कार्यकर्ताओं से अदालती लड़ाइयों के कारण हो रही देरी को लेकर निराशा जताई.

अडानी ने कहा, “जिस तरह इसमें देरी होती जा रही है उससे मैं सचमुच निराश हूं.”

उन्होंने ये भी कहा कि वो अनिश्चित काल तक इंतजार नहीं कर सकते और वो भारत स्थित अपने बिजली संयंत्रों के लिए कोयले के दूसरे स्रोत तलाश कर रहे हैं.

अडानी ने ये भी बताया कि उन्होंने पीएम टर्नबुल से पिछले साल प्रोजेक्ट से जुड़े मुकदमे खत्म करवाने की अपील की थी.

खबरों के अनुसार अडानी चाहते थे कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार ऐसा कानून बनाए जिससे सरकारी अनुमति मिलने के बाद किसी परियोजना को अदालत में चुनौती न दी जा सके.

इन अदालती मामलों के चलते ही दुनिया प्रमुख निवेशकों ने अडानी की परियोजना में पैसा लगाने से मना कर दिया था. अडानी को मना करने वालों में कोयला क्षेत्र के दुनिया के 13 बड़े निवेशक शामिल थे.

परियोजना के भविष्य को लेकर एसबीआई भी आशंकित था. पिछले साल दिसंबर में एसबीआई एक बयान जारी करके कहा कि उसने अडानी समूह को कोई लोन देने का वादा नहीं किया, बैंक ने केवल मेमोरैंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग(एमओयू) पर दस्तखत किया था.

इसके बाद अडानी की एकमात्र उम्मीद ऑस्ट्रेलियाई सार्वजनिक फंड था, टर्नबुल के इस बयान के बाद ये उम्मीद भी अब धूमिल होती दिख रही है.
सरकार बदलने के साथ बदलती किस्मत

नरेंद्र मोदी का गुजरात के सीएम के रूप में 12 साल लंबा कार्यकाल के दौरान अडानी समूह ने अभूतपूर्व विकास किया. इस दौरान कंपनी का कारोबार करीब 20 गुना बढ़ गया.

साल 2002 में कंपनी का टर्नओवर 3,741 करोड़ रुपये था, जबकि 2014 में ये बढ़कर 75,659 करोड़ रुपये हो गया.

अपने विकास में सरकार की भूमिका को स्वीकार करते हुए अडानी ने 2011 में फार्चून मैगजीन से कहा, “मुझे इस बात में पक्का भरोसा है कि आधारभूत ढांचे का कारोबार बगैर सरकारी कृपा के नहीं किया जा सकता.”

ऑस्ट्रेलिया में अडानी को ये सरकारी कृपा मिलती नहीं नजर आ रही. ऑस्ट्रेलिया में केंद्रीय सरकार और क्वींसलैंड की सरकार में हुए बदलाव अडानी के हित में नहीं रहे.

क्वींसलैंड की नेशनल पार्टी की सरकार अडानी के संग सहानुभूति रखती थी. तब सरकार ने अडानी की रेल परियोजना को उदार शर्तों के साथ लोन देने की बात कही थी. ये रेल परियोजना उनके खदान प्रोजेक्ट के लिए अहम थी. लेकिन वो पिछले साल जनवरी में हुए चुनाव में सत्ता से बाहर हो गई. सत्ता में आई लेबर पार्टी ने वो प्रस्ताव वापस ले लिया.

इसके बाद उम्मीद की जा रही थी कि ऑस्ट्रेलिया की केंद्र सरकार अडानी को रेल और बंदरगाह परियोजनाओं के लिए उदार शर्तों के साथ लोन देगी.

लेकिन जब टर्नबुल ने लिबरल पार्टी के आंतरिक चुनाव में टोनी एबॉट को हरा दिया तो अडानी को एक और झटका लगा.
पर्यावरण मुद्दों पर दोनों नेताओं का रुख काफी अलग माना जाता है. एबॉट आर्थिक विकास की राह में आने वाले पर्यावरण मुद्दों की ज्यादा परवाह नहीं करने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं. इसलिए वो अडानी की परियोजनाओं के समर्थक थे.

आंतरिक चुनाव के दौरान टर्नबुल ने एबॉट पर पर्यावरण से जुड़ी चिंताओं की अनेदखी को लेकर भी आलोचना की थी.

विपक्षी लेबर पार्टी के नेता बिल शॉर्टन भी अडानी की परियोजना को सार्वजनिक फंड दिए जाने के विरोधी रहे हैं.

यहां ये स्पष्ट कर देना जरूरी है कि कोई भी ऑस्ट्रेलियाई पार्टी इस परियोजना की विरोधी नहीं रही है, विरोध केवल इसे सार्वजनिक फंड से आर्थिक मदद दिए जाने को लेकर है.

यहां ये जानना भी रुचिकर रहेगा कि अडानी समूह दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों को चंदा देता रहा है. लिबरल पार्टी को कंपनी ने 50 हजार ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और लेबर पार्टी को 11 हजार ऑस्ट्रेलियाई डॉलर का चंदा दिया था.

अब आगे क्या?

अडानी ने भले ही कोयले के वैकल्पिक स्रोत तलाशने की बात कही हो लेकिन उनकी ऑस्ट्रेलियाई परियोजना के लिए आशा की किरण मंद होती जा रही है.

हाल ही में भारतीय विद्युत मंत्री पीयूष गोयल ने एक बयान जारी करके कहा था कि भारत अगले दो-तीन सालों में थर्मल आयात बंद करने के लक्ष्य की तरफ बढ़ रहा है. अडानी समूह के लिए ये घोषणा चिंता का सबब बन सकती है.

फिलहाल अडानी समूह की नजर छत्तीसगढ़ में नीलाम होने जा वाली चार कोयला खदानों पर है. कंपनी के पास पहले से ही इंडोनेशिया में एक कोयला खदान है जिससे वो मुंद्रा, गुजरात स्थित थर्मल पावर स्टेशन को कोयला आपूर्ति करती है.

इस साल मार्च में अडानी समूह को झारखंड के जितपुर स्थित कोयला खदान का ठेका मिला था. ये कंपनी को भारत में मिली पहली कोयला खदान थी.

अडानी समूह भारत और ऑस्ट्रेलिया में सौर ऊर्जा सेक्टर में भी तेजी से पैर फैला रहा है.

टर्नबुल के बयान से भले ही अडानी समूह को फौरी झटका लगा है, उसके ‘अच्छे दिन’ जल्द नहीं खत्म होने वाले.

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