9 साल की उम्र से अख़बार बाँट रही ‘अरीना ख़ान उर्फ पारो’ को मिला राष्ट्रपति सम्मान

May 13, 2016

राजस्थान: जयपुर शहर जब सुबह की नींद में डूबा रहता था तब 9 साल की एक लड़की सर्दी, गर्मी या फिर बरसात के मौसम में सुबह- सुबह चार बजे अपने छोटे छोटे पैरों से साइकिल के बड़े-बडे पैडल मार गुलाब बाग सेंटर पहुंच जाती थी। अरीना खान उर्फ पारो नाम की ये लड़की यहां से अखबार इकट्ठा करती और फिर निकल जाती उनको बांटने के लिए। पिछले 15 सालों से ये सिलसिला अब तक जारी है। पारो ने तब ये काम भले ही अपनी मजबूरी में शुरू किया था, लेकिन आज ये उसकी पहचान बन गया है। पारो जिन लोगों तक अखबार पहुंचाने का काम करती है उसमें जयपुर का राज परिवार भी शामिल है।
देश की पहली महिला हॉकर अरीना खान की सात बहनें और दो भाई हैं। इतने बड़े परिवार की जिम्मेदारी उनके पिता सलीम खान ही उठाते थे, लेकिन टॉयफाइड के कारण पारो के पिता बीमार और कमजोर हो गये थे और कमजोरी के कारण वो साइकिल नहीं चला पाते थे। तब अरीना अपने पिता की मदद करने के लिए उनके साथ जाने लगी। वो अपने पिता की साइकिल को धक्का लगातीं और घर-घर पेपर बांटने में उनकी मदद करतीं। अभी घर की गाड़ी खींच ही रही थी कि अचानक एक दिन अरीना और उनके परिवार के ऊपर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा। उनके पिता सलीम खान का बीमारी के कारण निधन हो गया। ऐसे में पूरे परिवार की जिम्मेदारी पारो पर आ गई, क्योंकि वो अपने पिता के साथ पेपर बांटने का काम करती थीं और उन्हें पता था कि किस घर में पेपर डालना है। उस समय 9 साल की बच्ची अपने भाई के साथ सुबह 5 बजे से 8 बजे तक पेपर बांटने का काम करने लगी।
शुरूआत में अरीना को इस काम में काफी परेशानी होती थी, क्योंकि 9 साल की वो बच्ची अक्सर रास्ते भूल जाया करती थीं। साथ ही उन्हें ठीक से ये भी याद नहीं रहता था कि किस घर में पेपर डालना है। छोटी बच्ची होने के कारण लोग जब पारो को दया की दृष्टि से देखते थे तब उसे और बुरा लगता था।
“तब मुझे पेपर बांटने का काम 7 किलोमीटर के दायरे में करना होता था। इनमें बड़ी चौपड़, चौड़ा रास्ता, सिटी पैलेस, चॉद पुल, दिलीप चौक, जौहरी बाजार और तिलपोलिया बाजार का एरिया शामिल था। तब मैं करीब 100 घरों में पेपर बांटने का काम करती थीं।”
मुसीबत के वक्त कम ही लोग मदद करते हैं, अरीना की मदद भी कुछ चुनिंदा लोगों ने की जो उनके पिता को जानते थे। इसलिए जब अरीना सुबह अखबार लेने जाती थीं। तब उनको लाइन नहीं लगानी पड़ती थीं। उन्हें सबसे पहले अखबार मिल जाते थे। लेकिन इसके बाद शुरू होती थी असली परेशानी। क्योंकि पेपर बांटने के बाद ही वो स्कूल जाती थी। ऐसे में अकसर वो स्कूल देर से पहुंच पाती और एक दो क्लास पूरी हो जाती थी। इस कारण रोज उनको प्रिसिंपल से डांट खानी पड़ती थी। तब अरीन खान 5वीं क्लास में पढ़ती थीं। एक दो साल इसी तरह निकल जाने के बाद एक दिन स्कूल वालों ने उनका नाम काट दिया। जिसके बाद अरीना एक साल तक अपने लिए नया स्कूल ढूंढती रहीं। क्योंकि उन्हें एक ऐसा स्कूल चाहिए था जो उनको देर से आने की इजाजत दे। तब रहमानी मॉडल सीनियर सेंकडरी स्कूल, ने उन्हें अपने यहां एडमिशन दे दिया। इस तरह पेपर बांटने के बाद 1 बजे तक वो स्कूल में रहतीं थीं।

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