क्या 5-सी सरकार द्वारा लिए जाने वाले बड़े फैसलों में बाधक हैं?

Apr 07, 2016

तो क्या वाकई में 5-सी सरकार द्वारा लिए जाने वाले बड़े फैसलों में बाधक हैं?

केंद्र सरकार के कोयला सचिव अनिल स्वरूप ने जिन 5-सी को सरकारी कामकाज में बाधा बताया है उनमें सीबीआई (केंद्रीय जांच ब्यूरो), सीवीसी (केंद्रीय सतर्कता आयोग), सीएजी (नियंत्रक व महालेखापरीक्षक), सीआईसी (केंद्रीय सूचना आयोग) व कोर्ट (अदालतें) शामिल हैं.

आला स्तर के इस नौकरशाह की पीड़ा से तमाम बड़े आईएएस अधिकारी सहमति जताते हैं लेकिन खुलकर बोलने सेंिहचकते हैं. कुछ अधिकारी ऐसे भी हैं जो बेझिझक इस मुद्दे पर अपनी राय व्यक्त भी करते हैं.

गौरतलब है कि केन्द्रीय कोयला सचिव अनिल स्वरूप ने अपने फेसबुक एकाउंट में साफतौर पर कहा है कि 5-सी त्वरित व प्रभावशाली निर्णय लेने की प्रक्रिया में बाधक हैं. विकास की गति को भ्रष्ट लोगों के कारण व्यवधान नहीं होता बल्कि ईमानदार अधिकारियों को इन एजेंसियों का भय खुलकर व त्वरित निर्णय लेने से रोकता है.

इसी का नतीजा है कि विकास की गति में अपेक्षित तेजी नहीं आ पा रही है. केन्द्र सरकार के इस आला अधिकारी की राय से पूरी तरह इत्तेफाक जताते हुए दिल्ली सरकार के समाज कल्याण विभाग के सचिव अिनी कुमार ने कहा कि यह सही समय है कि 5-सी गिरेबान में झांककर देखें कि उनके नियम देश की प्रगति में बाधा बन रहे हैं.

उन्होने कहा कि जब ये संस्थाएं पोस्टमार्टम करती हैं तो अधिकारियों को लगता है कि बड़े निर्णय लेकर आग में हाथ क्यों डाला जाए. देश में भ्रष्टाचार है इसमें कोई शक नहीं है लेकिन लोगों के पीछे सीबीआई छोड़ना समाधान नहीं है.

लोकपाल अच्छी संस्था है लेकिन यह भी समस्या का समाधान नहीं है. उदाहरण के तौर पर कोयला घोटाले को ही ले लीजिए. जिस समय कोल ब्लॉक आवंटन किया गया था, उस समय देश में कोयले की भारी किल्लत थी और तत्काल ठेके दिए जाने बेहद जरूरी थे.

काम होने के बाद उसमें जो कमियां निकाली गई, वह अपनी जगह ठीक हो सकती हैं, लेकिन ऐसे में जिस तरह अधिकारियों पर शिंकजा कसा गया, उससे उनके तत्कालिक फैसले लेने की प्रवृत्ति कहीं न कहीं हतोत्साहित भी होती है.

दिल्ली में भी अनधिकृत निर्माण बड़ी समस्या है लेकिन मूल कारण है कि बड़ी संख्या में लोगों के पास घर नहीं है. इसलिए मूल कारण पर ध्यान देने की जरूरत है जिसका सभाधान सीएजी व सीबीआई नहीं है.

 

केन्द्र सरकार में पूर्व सचिव सौरभ चंद्रा का मानना है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा में बदलाव की जरूरत है क्योंकि एक खास धारा के लगते ही सीवीसी, सीबीआई व कोर्ट की भूमिका शुरू हो जाती है.

अगर भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा में बदलाव हो जाता है तो इन तीन एजेंसी की भूमिका ही कम हो जाएगी. श्री सौरभ चंद्र ने बताया कि उन्होंने भ्रष्टाचार निरोधक कानून की धारा में बदलाव के लिए प्रधान मंत्री को सुझाव भी दिए थे जिसके बाद उसपर कार्रवाई भी हुई है.

दिल्ली सरकार के विशेष विजिलेंस आयुक्त बी एल शर्मा का मानना है कि कानून को लोगों के हित को देखकर बनाया जाना चाहिए लेकिन कानून को सख्ती से लागू करने की जरूरत है. समाज में अंकुश तथा चेक एंड बैलेंस भी चाहिए नहीं तो निरंकुशता का खतरा रहता है.
दिल्ली सरकार में बेहद प्रभावी व आक्रामक अधिकारी की छवि रखने वाले एक पूर्व नौकरशाह का कहना है कि हर निर्णय सरकार की नीति पर ही आधारित होते हैं. फैसले शून्य में नहीं लिए जाते, लेकिन फंसने का डर हो तो नौकरशाह क्यों कैरियर दांव पर लगाए?

अधिकारी में इतनी हिम्मत कहां कि अपना सुख चैन दांव पर लगाए. अगर फैसले लेने के बाद राजनीतिक सपोर्ट ही न मिले तो दिक्कत आती है. फिर इसका उपाय है कि बड़े फैसले पर सीबीआई, सीवीसी आदि को पहले ही फाइल भेजें, पहले ही पूछ लें कि क्या सब ठीक है, तभी बड़े निर्णयों की घोषणा की जाए. प्री आडिट, प्री विजिलेंस की व्यवस्था से निर्णय लेना आसान होगा.

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