37 साल पहले निकल भागा हत्यारा फिर शिकंजे में

Aug 08, 2016

कानून की आंखों में लगातार 37 साल तक धूल झोंकने के बाद हत्या का एक दोषी अब अंतत: कानून के शिकंजे में आ गया है. सीबीआई ने उसके खिलाफ आरोपपत्र दायर किया है.

यह आरोपी 1979 में ‘संदिग्ध’ हालात में उत्तर प्रदेश में कथित रूप से अपनी रिहाई कराने में सफल हो गया था.

यह हैरतंगेज मामला कृष्णा देव तिवारी का है जिसे इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी लेकिन रहस्यमय परिस्थितियों में वह 1979 में बस्ती जेल से रिहा हो गया था.

तिवारी ने दावा किया था कि वह 1996 तक अपनी सजा पूरी कर चुका था लेकिन 2015 में उच्चतम न्यायालय के आदेश पर मामले की जांच करने वाली सीबीआई ने पाया कि उसने अपनी सजा पूरी नहीं की थी और उसका कथन विरोधाभासी है.

सीबीआई सूत्रों ने 29 जुलाई को लखनऊ में दाखिल आरोपपत्र में कहा है कि बस्ती से उसकी रिहाई ‘संदिग्ध’ पायी गयी है.

सीबीआई की रिपोर्ट के आधार पर उच्चतम न्यायालय ने तिवारी और उसके भाइयों नंद किशोर तथा रमानंद को इस मामले में सुनवाई का सामना करने के लिए सोमवार तक अदालत के समक्ष समर्पण करने को कहा है.

तिवारी और उसके दोनों भाइयों को निचली अदालत ने हत्या के आरोपों में दोषी ठहराया था और आजीवन कारावास की सजा सुनायी थी. आरोपियों ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में इस आदेश को चुनौती दी थी.

उच्च न्यायालय ने कृष्णा देव की दोष सिद्धि को सही ठहराया लेकिन उसके भाइयों को हत्या के आरोपों से बरी कर दिया गया लेकिन उन्हें 16 अक्तूबर 1978 को भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत छह महीने की सजा सुनायी.

सजा की पुष्टि के बाद कृष्णा देव को बस्ती जेल से वाराणसी जेल भेज दिया गया. वह चार दिसंबर 1978 को फिर से बस्ती जेल में आ गया और एक जनवरी 1979 को रिहा हो गया.

ऐसा आरोप है कि कृष्ण देव ने न तो समर्पण किया था और न ही उसने आजीवन कारावास की सजा पूरी की थी.

उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गयी जांच दर्शाती है कि ऐसा कोई रिकार्ड नहीं है जिससे उन परिस्थितियों का संकेत मिले जिनके तहत कृष्ण देव को बस्ती जेल से रिहा किया गया.

सूत्रों ने यह जानकारी दी. उन्होंने यह भी बताया कि जिस अदालती आदेश या जज के नाम पर उसे रिहा किया गया, वह रिकार्ड में नहीं है.

अतिरिक्त महानिदेशक और गोरखपुर रेंज के डीआईजी द्वारा की गयी जांच कहती है कि जो कुछ रिकार्ड में है वह यह है कि कृष्ण देव को तत्कालीन जेल निरीक्षक बी एन श्रीवास्तव तथा दोषी कैदियों के प्रभारी हरिओम सक्सेना के हस्ताक्षरित दस्तावेज के आधार पर पैरोल पर रिहा किया गया .

सीबीआई सीआईडी उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा की गयी जांच के दौरान कृष्ण देव ने दावा किया था कि वह सजा पूरी कर चुका है और दो अक्तूबर 1996 तक लगातार जेल में रहा है जब उसे सजा पूरी होने पर अंतत: रिहा किया गया था.

उसने दावा किया था कि उसे 1979 में तीन महीने के लिए पैरोल पर रिहा किया गया था लेकिन उसने समर्पण कर दिया था और सजा पूरी की थी.

बस्ती जेल के पिछले 90 सालों के रिहाई रजिस्टर की जांच करने पर सीबीआई सीआईडी इस नतीजे पर पहुंची कि उसका बयान गलत है क्योंकि उसके दावे को सही ठहराने वाला कोई रिकार्ड नहीं है.

उच्चतम न्यायालय ने सीबीआई को मामले की जांच का निर्देश देते हुए कहा था, ‘‘प्रथम दृष्टया इस मामले के तथ्य यह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश राज्य में गंदगी गहरे तक जड़ें जमाए हुए है. ऐसा कोई और मामला देखने में नहीं आया जहां यदि किसी दोषी को जेल में बंद किया गया हो और वह इस प्रकार से हिरासत से अपनी रिहाई तय करा ले.’

उच्चतम न्यायालय ने कहा, ‘यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जिन एजेंसियों को कानून का शासन कायम करने की जिम्मेदारी सौंपी गयी है वे स्वयं इस प्रकार की जालसाजी में शामिल हैं.’

अपनी प्रारंभिक जांच पूरी करने के बाद सीबीआई ने दावा किया था कि कृष्ण देव ने अपनी सजा पूरी नहीं की थी और इस मामले में आगे जांच की जरूरत है. उच्चतम न्यायालय ने एक जुलाई को सीबीआई को इसकी इजाजत दे दी.

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