जाति समीकरणों को ‘बैलेंस’ करने की जुगत में भाजपा

Aug 06, 2016

नितिन पटेल शुक्रवार को दिन भर टीवी चैनलों पर गुजरात के भावी मुख्यमंत्री के रूप में इंटरव्यू देते रहे और ये लगभग तय माना जा रहा था कि आनंदीबेन पटेल के बाद उन्हीं की ताजपोशी होने वाली है, मगर सारा खेल उलट चुका था. आख़िरी क्षणों में विजय रूपाणी का नाम सामने आया तो सब दंग रह गए.

मगर भारतीय जनता पार्टी पर नज़र रखने वाले विश्लेषक इससे क़तई हैरान नहीं थे. वो इसलिए क्योंकि उन्होंने देखा कि हरियाणा और झारखंड में क्या हुआ था. जहाँ हरियाणा में जाट समाज से किसी को मुख्यमंत्री नहीं बनाते हुए मनोहरलाल खट्टर को ताज पहनाया गया, वहीं झारखंड को भारतीय जनता पार्टी ने रघुबर दास के रूप में पहला ग़ैर आदिवासी मुख्यमंत्री दिया.

राजनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि दरअसल यह भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह के काम करने का तरीका है.

झारखंड और हरियाणा के बारे में कहा जाता है कि इन राज्यों के फैसले दिल्ली में ही ज़्यादा होते हैं. वैसे इस मामले में नितिन पटेल थोड़ा खुशकिस्मत रहे. यह उनका व्यक्तित्व कम और उनके समाज के प्रभाव की वजह से ज्यादा हुआ कि वो कम से कम उपमुख्यमंत्री तो बनाए गए.

हालिया घटनाक्रम से गुजरात की राजनीति ने एक नई करवट ले ली है. यह बात साफ़ है कि जैन-बनिया समाज के मुख्यमंत्री और पटेल उपमुख्यमंत्री बनाकर भारतीय जनता पार्टी आने वाले विधानसभा चुनावों से पहले ही जातिगत समीकरणों को ‘बैलेंस’ करने की कोशिश कर रही है.

राजनीतिक दबदबा

गुजरात में पटेलों का राजनीतिक दबदबा हमेशा से ही क़ायम रहा और उनके दबदबे की वजह से ही कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी सत्ता पर क़ाबिज़ होते रहे हैं. इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 1960 में गुजरात के अलग राज्य बनने के बाद से यहाँ की राजनीति में पटेल ही हावी रहे और ज़्यादातर मुख्यमंत्री भी इसी समाज से रहे.

चाहे वो चिमनभाई पटेल हों जो दो बार मुख्यमंत्री रहे या फिर बाबूभाई जसभाई पटेल हों, जो आपातकाल के दौरान मुख्यमंत्री थे. केशूभाई पटेल या फिर आनंदीबेन पटेल भी इसी कड़ी के हिस्सा थे.

समाजशास्त्री घनश्याम शाह के अनुसार, 1950 की शुरुआत में सौराष्ट्र में हुए भूमि सुधार का भी सबसे ज़्यादा लाभ पाटीदारों को हुआ जिससे उनकी आर्थिक स्थिति काफी मज़बूत हो गई. भूमि सुधार का नुकसान क्षत्रियों को हुआ.

उनका कहना है कि 1970 के दशक से पटेल समाज के लोगों ने कांग्रेस से किनारा इसलिए करना शुरू कर दिया था क्योंकि कांग्रेस एक दूसरे राजनीतिक समीकरण को लेकर आगे चल रही थी जिसमें अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी और मुसलमान शामिल थे.

1980 के दशक में पटेल पहले जनता पार्टी के साथ जुड़े. बाद में भाजपा बनने के बाद उनका वर्चस्व भाजपा में भी बढ़ा.

अनदेखी नहीं

वहीं राजनीतिक मामलों के जानकार अच्युत याग्निक का कहना है कि नितिन पटेल को नयी सरकार में महत्वपूर्ण ज़िम्मेदारी देकर भारतीय जनता पार्टी ने पटेलों को संदेश देने की कोशिश यह की है कि वो पटेलों की अनदेखी नहीं कर रही है.

अच्युत याग्निक का ये भी मानना है कि पटेलों के समर्थन की वजह से ही गुजरात में भारतीय जनता पार्टी का शासन वर्ष 1995 से ही चल रहा है. गुजरात में पटेल 15 प्रतिशत हैं जबकि दलित 7 प्रतिशत.

जानकार मानते हैं कि हार्दिक पटेल द्वारा आरक्षण के लिए चलाए गए आंदोलन से भाजपा को झटका ज़रूर लगा है और यह सामने नज़र भी आ रहा है.

पिछले साल दिसंबर में शहरी निकाय के चुनावों में भाजपा को ग्रामीण क्षेत्रों में नुकसान हुआ था, हालांकि शहरी इलाक़ों में भाजपा की स्थिति उतनी खराब नहीं हुई.

मगर कथित गौरक्षक दल के दलितों पर हमले के बाद शुरू हुए आंदोलन ने गुजरात में खासी हलचल पैदा कर दी है.

पटेल नाराज़, दलित भी और 15 प्रतिशत आदिवासी भी अपनी राजनीतिक अनदेखी से ज़्यादा खुश नहीं नज़र आ रहे हैं.

मौजूदा हालात में अगर 10 प्रतिशत मुसलमान, आदिवासी और दलित साथ आ जाते हैं तो आने वाले विधानसभा के चुनावों में भारतीय जनता पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

यही कारण है कि भारतीय जनता पार्टी नहीं चाहेगी कि पटेलों के बीच उसकी बनी बनाई पैठ पर असर पड़े. साथ ही वो सवर्णों और अत्यंत पिछड़े वर्ग को भी साथ लेकर चलना चाहती है.

जानकारों को लगता है कि ऐसे में पटेल समाज का उपमुख्यमंत्री इस समाज में पार्टी के आधार को बनाये रखने में काफी कारगर साबित हो सकता है.

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