‘रज़ा पाक जाते तो होता गांधी से विश्वासघात’

Jul 24, 2016

सैयद हैदर रज़ा जीते थे ताकि चित्र बना सकें और चित्र बनाते थे ताकि जी सकें. हम लोग आखिरी पल तक उम्मीद कर रहे थे कि वो फिर उठ खड़े होंगे.

सैयद मध्यप्रदेश के मंडला में ऐसी छोटी जगह पर पैदा हुए जहां कुल आठ घर थे और वहां से उठकर चित्रकला के जिस शिखर को छुआ वो दुर्लभ है.

94 साल की आयु पूरी कर चुके थे और यह पूर्ण जीवन था. बहुत उदार चरित्र था और उन्होंने लेखकों, कवियों, कलाकारों की जितनी मदद की वो किसी और ने नहीं की.

अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा उन्होंने ऐसे ही कामों के लिए बने सैयद रज़ा फाउंडेशन के लिए निकाल दिया था.

सैयद रज़ा की जिजीविषा बहुत मज़बूत थी और बीते कुछ सालों में उन्होंने जीने और चित्र बनाने के बीच जो अनिवार्य दूरी होती है, उसे लगभग पूरी तरह से खत्म कर दिया था.

मां से बहुत प्रभावित थे और महात्मा गांधी के लिए उनके मन में बड़ा आदर था. घर के बहुत सारे लोग आज़ादी के बाद पाकिस्तान चले गए लेकिन वो यहीं भारत में रहे.

आठ साल की उम्र में उन्होंने गांधी जी को देखा था और बंटवारे के बाद पाकिस्तान जाने की बात हुई तो उन्हें लगा कि ये उस बूढ़े आदमी के साथ विश्वासघात होगा.

वो अपनी मातृभाषा हिंदी बताते थे और हिंदी की कविताओं में उनकी खूब दिलचस्पी थी वो अपने हाथ से दूसरों की कविताएं लिखा करते थे.

करीब 60 वर्ष तक फ्रांस में रहने के बावजूद उन्होंने लगातार हिंदी के साथ अपना साथ बनाए रखा. उनके जैसे बहुभाषी कलाकार भी बहुत कम ही होंगे. वो हर रोज तीन भाषाएं बोलते थे, फ्रेंच, अंग्रेजी और हिंदी.

फ्रांस के बारे में उनका कहना था कि चित्र बनाना उन्हें फ्रांस ने सिखाया.

जब चित्र बनाना सीख लिया तो उनके मन में सवाल उठा कि इन चित्रों में भारत और वो खुद कहां हैं तो उन्होंने उनमें पुराने भारतीय अभिप्रायों को चित्रों में ढालना शुरू किया और एक नई चित्रभाषा को गढ़ा.

भारत आने के बाद अक्सर ऐसा होता कि वो चित्र बनाते रहते और मैं उन्हें देखा करता. ऐसी एकाग्रता मैंने कहीं नहीं देखी.

आखिरी बार यहां आने के बाद बीते पांच वर्षों में उन्होंने चार सौ से ज्यादा चित्र बनाए होंगे. उनमें कई तो बहुत बड़ी कृतियां हैं.

वो कभी लोकप्रियता के चक्कर में नहीं पड़े, उन्होंने कोई समझौता नहीं किया और जिद पर अड़े रहने की विरासत पीछे छोड़ गए.

सैयद रज़ा ये नहीं चाहते थे कि लोग उनकी तरह चित्र बनाएं बल्कि ये चाहते थे कि लोग अपनी तरह से चित्र बनाएं.

सैयद रज़ा भारतीय चित्रकला की उस मूर्धन्य त्रयी का हिस्सा थे जिसमें बाकी दो नाम एमएफ हुसैन और फ्रांसिस न्यूटन शुज़ा का है. उनके निधन से वो मूर्धन्यता खत्म हो गई.

(वैभव श्रीवास्तव से अशोक वाजपेयी की बातचीत पर आधारित)

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