रस्म के नाम पर बच्चियों के साथ होता है सेक्स

Jul 23, 2016

दक्षिण पूर्वी अफ्रीकी देश मलावी के सुदूर दक्षिणी हिस्से में लड़कियों के परिपक्व होने पर एक सेक्स वर्कर के साथ सेक्स कराए जाने की एक अनोखी परंपरा है.

इस सेक्स वर्कर को हायना कहते हैं.

गांव के बड़े-बुजुर्ग इसे न ही बलात्कार मानते हैं और ना ही इसमें कोई बुराई देखते हैं. वे इसे ‘शुद्धिकरण’ की एक रस्म के तौर पर देखते हैं.

लेकिन जिस हायना से मुलाक़ात हुई वो एड्स से पीड़ित था और रस्म के मुताबिक़, उसे कंडोम भी इस्तेमाल नहीं करने दिया जाता है और ना ही वो ये बात उजागर करता है.

इसलिए रस्म के कारण एड्स जैसी सेक्स से जुड़ी बीमारियों के फैलने का बड़ा ख़तरा है.

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक़, मलावी में हर दस में से एक औरत या मर्द एचआईवी से संक्रमित है.

दक्षिणी मलावी के नीसांजे ज़िले में मेरी मुलाकात एरिक एनीवा से हुई जो कि एक हायना हैं. यहां समाज के लोग ‘शुद्धिकरण’ के तहत सेक्स करने के लिए हायना को भाड़े पर बुलाते हैं.

‘शुद्धिकरण’ के तहत अगर कोई आदमी मर जाता है तो उसकी बीवी को अपने पति के दाह संस्कार से पहले ‘हायना’ के साथ सोना पड़ता है. अगर किसी औरत का गर्भपात हो गया हो तो तब भी उसे ‘यौन शुद्धिकरण’ की इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है.

और सबसे अचरज की बात है कि यहां लड़कियों की पहली माहवारी के बाद ही उन्हें ‘शुद्धिकरण’ की इस प्रक्रिया से गुजरना होता है.

अगर लड़कियां संबंध बनाने से इंकार कर दें तो माना जाता है कि उनके परिवार या पूरे गांव के साथ बीमारी या कुछ बहुत बुरा होने वाला है.

एनीवा ने बताया, “मैंने जिन लोगों के साथ संबंध बनाया है उनमें से ज्यादातर स्कूल जाने वाली लड़कियां हैं.”

“कुछ लड़कियां तो 12 या 13 साल की रही होंगी लेकिन मैं अधिक उम्र की लड़कियों को तरजीह देता हूं. ये सभी लड़कियां मुझे हायना के रूप में पाकर काफी खुश होती हैं. वे वाकई फ़क्र महसूस करती हैं और लोगों से कहती हैं कि यह आदमी सही में एक मर्द है. यह जानता है कि कैसे एक औरत को खुश किया जाता है. “

उनके दावों के बावजूद बगल के गांव की कई लड़कियों ने इस रस्म के प्रति अपने गुस्से का इज़हार किया.

इनमें से एक लड़की मारिया ने कहा, “मेरे पास इसे करने के सिवा कोई दूसरा चारा नहीं था. मुझे अपने माता-पिता की खातिर यह करना पड़ा. अगर मैं यह करने से इंकार कर देती तो मेरे परिवार के लोगों को बीमारियां हो जातीं और उनकी मौत भी हो सकती थी. इसलिए मैं डर गई थी.”

उन्होंने मुझे बताया कि उनकी सारी दोस्तों को हायना के साथ सेक्स करना पड़ा है.

एनीवा की उम्र चालीस के आस-पास लगती है. वे अपनी उम्र को लेकर निश्चित नहीं हैं. उनकी दो बीवियां हैं और वे दोनों ही एनीवा के काम के बारे में अच्छे से जानती हैं.

एनीवा का दावा है कि उन्होंने अब तक 104 औरतों और लड़कियों के साथ सेक्स किया है. उन्होंने साल 2012 में एक स्थानीय अख़बार में भी यही संख्या बताई थी. मुझे लगता है कि वे काफी अर्से पहले इसका हिसाब लगाना भूल चुके हैं.

एनीवा के पांच बच्चे हैं जिनके बारे में उन्हें पता है. उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नहीं है कि उन्होंने कितनी लड़कियों और औरतों को गर्भवती बनाया है.

उन्होंने मुझे बताया कि नीसांजे में उन्हें मिलाकर दस हायना हैं जो कि ज़िले के सभी गांवों में हैं.

उन्हें एक बार सेक्स करने के लिए क़रीब 200 से लेकर 500 रुपये तक मिलते हैं.

फिर मेरी मुलाक़ात पचास की उम्र के आस-पास की औरतें फागीसी, क्रिसी और फेलिया से हुई जिनके ऊपर अपने गांव में इस पंरपरा को बनाए रखने की ज़िम्मेदारी है.

ये उनकी ज़िम्मेदारी है कि वे हर साल कैंप में जवान होती लड़कियों को ले आएं और उन्हें ये बताएं कि उन्हें एक पत्नी के तौर पर कैसे रहना है और किसी मर्द को सेक्स का सुख कैसे देना है.

‘यौन शुद्धिकरण’ इस प्रक्रिया का आख़िरी चरण होता है जो कि लड़की के मां-बाप की स्वेच्छा से आयोजित किया जाता है.

मैंने जब उनके सामने ‘यौन शुद्धिकरण’ के कारण बीमारियों के होने के जोखिम का जिक्र किया तो उनका कहना था कि अच्छे चरित्र वालों को ही हायना के तौर पर चुना जाता है. इसलिए वे एचआईवी या एड्स से संक्रमित नहीं हो सकते हैं.

इस रस्म के मुताबिक़, कंडोम के इस्तेमाल पर भी पाबंदी है.

इससे यह साफ़ तौर पर दिखता है कि इस रस्म की वजह से यहां के लोगों में एचआईवी का बड़ा जोखिम है.

जब मैंने एनीवा से एचआईवी संक्रमण के बारे में पूछा तो उन्होंने बताया कि वे एचआईवी से संक्रमित हैं लेकिन यह बात जब उन्हें भाड़े पर सेक्स करने के लिए बुलाया जाता है तो वे लड़कियों के मां-बाप को नहीं बताते हैं.

वो मानते हैं कि इस परंपरा की वजह से एड्स फैलने का जोखिम बढ़ता है.

इस रस्म को निभाने वालों को पता है कि चर्च के साथ-साथ बाहरी लोग, एनजीओ और सरकार भी इस रस्म के ख़िलाफ़ है.

सरकार ने इसके ख़िलाफ़ एक अभियान भी चला रखा है.

जेंडर और वेलफेयर मंत्रालय की स्थायी सचिव डॉक्टर मे शाबा का कहना है कि हम इन लोगों की निंदा नहीं कर रहे हैं बल्कि हम उन्हें यह बता रहे हैं कि उन्हें अपने रस्म को बदलने की ज़रूरत है.

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