दास्तानगोई में गूंजती औरतों की आवाज़

Jul 22, 2016

हाल के वर्षों में भारत में दास्तानगोई की पुरानी कला फिर से प्रचलन में दिख रही है लेकिन आज भी इसपर पुरुषों का ही कब्जा है.

अनुसूइया बसु दास्तानगोई करने वाली चुनिंदा महिलाओं में से उन दो महिलाओं की कहानी पेश कर रही हैं जो इस पुरुषों के दबदबे वाले इस क्षेत्र में मज़बूत दख़ल दे रही हैं.

इनमें से एक है तीस वर्षीय फ़ौज़िया. फ़ौज़िया के मुताबिक उन्हें बचपन से ही कहानियां बहुत आकर्षित करती थीं. उनका बचपन दिल्ली में बीता है.

उनकी मां अक्सर उन्हें चेतावनी देते हुए कहा करती थी कि “कहानियां तुम्हें किसी रोज़ मुसीबत में डाल देंगी.”

लेकिन वो थीं कि “कहानी की हर एक किताब पढ़ जाना चाहती थीं.”

फ़ौज़िया की मां अक्सर उन्हें उर्दू की क्लासिक कहानियां पढ़कर सुनाती थीं जिसने फ़ौज़िया की कल्पना की उड़ान में पंख लगाए. उनके पिता एक मोटर मैकेनिक थे.

आज फ़ौज़िया उर्दू की जानी-मानी दास्तानगो हैं. उनकी दास्तानों में साहस, जादू और लड़ाई की कहानियां शामिल होती हैं.

दास्तानगोई फारसी के दो शब्दों से मिलकर बना है दास्तां (कहानी) और गोई (सुनाना). उर्दू साप्ताहिक नई दुनिया के संपादक शाहिद सिद्दीकी कहते हैं कि मध्य एशिया के देशों और ईरान में दास्तानगोई मनोरंजन का लोकप्रिय माध्यम था.

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वो बताते हैं कि दास्तानगोई को “सोलहवीं शताब्दी में दक्षिण भारत में राजाओं का संरक्षण प्राप्त था और यह एक गंभीर कला माध्यम बन चुका था.”

आगे वो बताते हैं, “मुगल काल के दौरान अपने दरबार में दास्तानगो रखने और इस कला को लोकप्रिय बनाने के लिए बादशाह अकबर की काफी शौहरत थी.”

21वीं सदी में फ़ौज़िया उन गिनी-चुनी महिलाओं में हैं जो इस कला को फिर से लोकप्रिय बनाने में लगी हुई हैं. उन्होंने दास्तानगोई में ही अपनी ज़िंदगी समर्पित कर दी है और शादी नहीं करने का फ़ैसला लिया है.

वो बताती हैं, “मैंने स्कूल में उर्दू पढ़ा ताकि मैं सारे क्लासिक पढ़ सकूं. मैं जानती थी कि मुझे अपने खयालों की दुनिया से मोहब्बत की खातिर कुछ बड़ा करना था. मैंने अच्छी-खासी तनख्वाह वाली नौकरी की बजाए दास्तानगोई को पेशे के तौर पर चुना. परिवार ने मेरे हर कदम पर मेरा साथ दिया.”

फ़ौज़िया ने ट्यूशन पढ़ाकर अपनी यूनिवर्सिटी की पढ़ाई पूरी की है. उन्होंने हिंदी साहित्य में एमए किया और एक गैर-सरकारी संगठन में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर नौकरी शुरू की.

लेकिन इतिहासकार और लेखक महमूद फ़ारूक़ी से दास्तानगोई का प्रशिक्षण लेने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी.

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लेकिन उन्हें मर्दों के आधिपत्य वाले इसे पेशे में अपनी जगह बनाने में खासी मुश्किलें हईं. वो अब भी उस दिन को याद करती हैं जब 2006 में पहली बार उन्होंने परफॉर्मेंस दिया था और “दास्तानगो के रूप में एक औरत को देखकर श्रोताओं को अचरज” हुआ था.

उन्होंने बीबीसी से कहा, “औरतें सार्वजनिक तौर पर नहीं बल्कि अकेले में कहानियां कहती हैं. लेकिन मैंने इसे बदलने की कोशिश की है और देश भर में अब तक 88 शो कर चुकी हूं.”

वो बताती हैं कि एक मुसलमान औरत के तौर पर “उनके लिए रूढियों को तोड़ना मुश्किल था.”

वो कहती हैं, “मैं हिजाब या बुर्का नहीं पहनती थी. इसलिए शुरू में लोग ताज्जुब करते थे लेकिन धीरे-धीरे उन्होंने मुझे स्वीकार किया.”

फ़ौज़िया की तरह पूनम गिरधानी भी दास्तान गोई को कहानी कहने की एक कला के तौर पर फिर से स्थापित करने में लगी हुई हैं.

39 साल की पूनम गिरधानी एक स्वतंत्र लेखिका और रेडियो कलाकार हैं. उन्होंने पांच साल पहले अपनी हिचक छोड़ी और अब एक दास्तानगो के तौर पर फ़ौज़िया के साथ कई मौकों परफॉर्मेंस दे चुकी हैं.

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उन्होंने बीबीसी से कहा, “मैं पिछले पांच साल से दास्तानगो हूं. जो लोग हिंदी और उर्दू नहीं जानते, वे भी मेरा शो देखने आते हैं.”

उनके सबसे कामयाब शो में ‘दास्तान एलिस की’ का शुमार होता है.

उन्होंने इसमें महमूद फ़ारूक़ी की टीम के अहम हिस्से के तौर पर शिरकत की है.

यह शो लुईस कैरोल की ‘एलिस एडवेंचर्स इन वंडरलैंड’ और ‘थ्रू द लूकिंग ग्लास’ का रूपांतरण है.

पूनम गिरधानी कहती हैं, “दास्तानगो की सबसे बड़ी सफलता अपने श्रोताओं को दूसरी दुनिया में ले जाना है जहां सिर्फ शब्दों की बदौलत कहानी परत-दर-परत खुलती जाए.”

महमूद फ़ारूक़ी का मानना है कि भारत में दास्तानगोई के लोकप्रिय होने की असीम संभावनाएं हैं.

उनका कहना है, “दास्तानगोई के लिए बहुत कम सुविधाओं की जरूरत पड़ती है. एक बैठने की जगह, माइक्रोफोन और पुराने समय का एहसास पैदा करने के लिए कुछ मोबत्तियां. सीधे तौर पर एक कहानी पढ़ने से जुदा अंदाज़ होने की वजह से लोगों की इसमें दिलचस्पी बढ़ रही है. इसमें बड़े पैमाने पर आवाज़ का उतार-चढ़ाव होता है.”

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