4500 साल पुरानी ममी में भारतीय ने जान फूंकी

Jul 05, 2016

मुंबई के प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय में रखी गई 4500 साल पुरानी ममी फिर से अपने पुराने रूप में वापस आ गई है. ममी के कई हिस्से क्षतिग्रस्त हो गए थे.

संग्रहालय के मुख्य संरक्षक अनुपम साह ने म्यूज़ियम में 1920 से रखी ममी की मरम्मत की है.

ये ममी मिस्र की राजकुमारी नाएशू की है जो फैराओ VI की बेटी थीं. वो 2500 बीसी के करीब पैदा हुई थीं.

एक साल पहले क्यूरेटरों ने पाया कि देख-रेख की कमी और सड़न को ठीक करने के तरीके नहीं जानने के कारण ये ममी ख़राब हो रही है.

दुनिया भर के कई अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों और संग्रहालयों के विशेषज्ञों की सलाह ली गई. इसमें लंदन का ब्रिटिश म्यूज़ियम और मिस्र के कई संग्रहालयों शामिल थे. लेकिन इससे फायदा नहीं हुआ.

इस बीच, ममी की ऊपरी परत में दरारें आने लगीं और ये टूटने लगी. ममी के चेहरे, कंधे, छाती और पैरों की परतें निकलने लगीं.

ऐसा होने से पट्टियां दिख़ने लगीं जिससे वो ढीले होकर खुलने लगीं. इसका असर अंदरुनी पट्टियों पर भी दिखने लगा था.

इन स्थितियों में संग्रहालय के अधिकारियों ने साह को मदद के लिए बुलाया. उऩ्होंने इस प्रोजेक्ट पर मार्च अंत से लेकर अप्रैल तक काम किया.

इसमें विशेषज्ञों के छह सदस्यों की टीम शामिल रही.

अनुपम साह और उनकी टीम ने पट्टियों को बिना रसायन या ‘बाहरी’ चीज़ की मदद लिए दोबारा लगाया. इस प्रक्रिया में कुछ हफ़्तों का वक्त लगा.

राजकुमारी नाएशू की ममी हैदराबाद स्टेट म्यूज़ियम में 1920 में आई. इसका भारत पहुंचने का सफ़र मिस्र से शुरू हुआ था.

हैदराबाद के निज़ाम मीर महबूब अली खान के दामाद नज़ीर नवाज़ जंग ने राजकुमारी की ममी को मिस्र में खरीदा था.

हालांकि उन्होंने इसे किसी निजी कलेक्टर से ख़रीदा था या म्यूज़ियम से, ये साफ़ नहीं है.

माना जाता है कि इस ममी को खरीदने के लिए उन्होंने एक हज़ार पाउंड से ज्यादा खर्च किए थे.

नज़ीर नवाज़ जंग ने इस ममी को अगले निज़ाम मीर ओस्मान अली खान को तोहफ़े में दिया जिन्होंने इसे मुंबई के प्रिंस ऑफ वेल्स संग्रहालय को दान कर दिया.

तब से यह ममी कांच के ताबूत में रखी हुई थी.

बीबीसी से बातचीत में तेलंगाना सरकार के पुरातत्व और संग्रहालय के निदेशक एनआर विसालची ने बताया कि भारत में मौजूद छह प्रामाणिक मिस्र की ममियों में से नाएशू अकेली ऐसी ममी है जो दक्षिण भारत में मौजूद है.

हाल तक माना जाता था कि नाएशू की मौत 18 साल की उम्र में हुई थी जब वो गर्भवती थीं.

लेकिन हाल ही में संग्रहालय की ओर से किए गए मेडिकल और दूसरे टेस्ट में पता चला कि उनकी उम्र करीब 24 साल थी.

साह के मुताबिक मिस्र की ज़्यादातर ममियों में मस्तिष्क का कोई हिस्सा नहीं होता है लेकिन इस ममी में दिमाग के कुछ हिस्से सही सलामत थे.

विशेषज्ञों की टीम नियमित रूप से इस्तेमाल होने वाले उपकरण और प्रक्रियाओं से ममी की मरम्मत नहीं कर सकते थे और यही इसे पेचीदा बना रही थी.

साह के मुताबिक ममी को ठीक करने की प्रक्रिया जटिल होती चली गई. क्योंकि जांच की सामान्य प्रक्रिया, ट्रीटमेंट का तरीका, इंफ्रा-रेड और अल्ट्रा वायलेट किरणों और रंग का विश्लेषण करने के लिए स्पेक्ट्रोमीटर के तरीकों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था.

साह ने बीबीसी को बताया, “हमें ममी को रूई की परतों में लपेटकर जांच केंद्र ले जाना पड़ा. वहां हमने इसकी हड्डियों का एक्स-रे और सीटी स्कैन करवाया. इस काम में बेहद सावधानी बरतनी पड़ी. धूप कड़ी होने से पहले इसे वापस भी ले आए.”

स्कैन और एक्स-रे रिपोर्ट ने वैसे तो ममी को ‘फिट’ बताया लेकिन अभी भी ममी को कुछ कॉस्मेटिक सुरक्षा की ज़रूरत थी.

एनआर विसालची के अनुसार इस ममी को अब नाइट्रोजेन चेंबर में रखा जाएगा ताकि इस पर ऑक्सीजन का असर ना हो और इसे जर्जर होने से भी बचाया जा सके.

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