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बंद हो रहे हैं भारत में ईरानी कैफ़े

Jun 30, 2016

ईरानी चाय, बन मस्का कैरामेल कस्टर्ड, पफ और कटलेट के लिए विख्यात ईरानी कैफ़े बीते कुछ सालों से बंद होती जा रहे हैं. मुंबई जैसे बड़े शहरों की विशेषता रह चुके ये कैफे कई हिंदी फिल्मों में भी नज़र आए हैं. 1988 की तेज़ाब से लेकर 2013 में आई फिल्म लंच बॉक्स में इन्हें देिखाया गया था.

अब जो ईरानी होटल चल रहे हैं वो ज़्यादातर दक्षिण मुंबई के इलाके में दिखते हैं. कयानी एंड कंपनी, याज़दानी, मेरवान एंड कंपनी, ब्रिटैनिया एंड कंपनी और ससानियन उनमें जाने माने होटल हैं.

ईरानी कैफे की कुछ अलग ख़ासियतें हैं. जैसे कि लकड़ी की कुर्सियां, चौकोर टेबल क्लॉथ, पेंडुलम वाली घड़ियां, पुराने पंखे लेकिन सबसे अधिक जो लोगों को भाता है वो है वेटर या मैनेजर का दोस्ती भरा व्यवहार. मुंबई जैसी भागदौड़ वाले शहर में ये मिलना मुश्किल है.

आधुनिक जीवनशैली और लोगों में बाहर खाने पर खर्च करने की बढ़ती क्षमता में लोगों ने ईरानी कैफ़े का साथ छोड़ दिया है. महंगाई और मॉडर्न होटलों से ईरानी कैफ़े मुक़ाबला नहीं कर पातीं. आज ईरानी कैफ़े में आऩे वाले वही लोग हैं जो इनके इतिहास के महत्व को समझते हैं या फिर दिल से इनके खाने और चाय को पसंद करते हैं. इन ग्राहकों में बुज़ुर्ग ही नहीं बल्कि नौजवान लोग भी हैं.

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ईरानी कैफ़े में अकसर जाने वाली प्रुथा कदम का कहना है,”मुझे मॉडर्न होटलों में जाना पसंद नहीं वहां लोग अपनी ठाठ दिखाते हैं, ईरानी कैफ़े में आने का मज़ा अलग है. यहां की सर्विस और खाना जिस भाव में मिलता है वैसा शायद ही कहीं पर मिले, इसके साथ ही ये होटल ऐतिहासिक भी हैं.’’

लालू भतीजा तो अपने स्कूल और कॉलेज के दिनों से ससानियन एंड कंपनी बोउलांगेरी में अपने दोस्तों के साथ आते रहे हैं. वह कहते हैं,’’हमारे ज़माने में ये होटल सारे मुंबई में, हर इलाक़े में हुआ करती थीं, आज कुछ ही गिने चुने ईरानी कैफ़े बची हैं, ये बहुत दुख की बात है.’’

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आज भले ही ये ईरानी कैफ़े महंगाई और मॉडर्न होटल के मुक़ाबले से जूझ रही हों लेकिन इन्हीं के बीच ब्रिटैनिया एंड कंपनी जबर्दस्त कारोबार कर रही है. इनका बेरी पुलाव बहुत ही विख्यात है. दिन में कुछ समय ऐसे हैं कि अगर यहां पर जाओ तो अंदर जाने के लिए एक घंटा इंतज़ार करना पड़ता है.

मुंबई के माहिम इलाक़े में एक नया ईरानी कैफे खुला है, जिसका नाम है कैफ़े ईरानी चाय. पिछले पचास साल में पहले मुंबई में कोई ईरानी कैफ़े खुला है. इसके मालिक पारसी होटल के आकर्षण और संस्कृति को बनाए रखना चाहते हैं.

इन लोगों की इस पहल से पता चलता है कि इस परिस्थिति में भी लोग होटल चलाते रहने की उम्मीद बनाए हुए हैं. बस जरूरत है तो ऐसे कारोबारियों की जो ईरानी कैफे को फिर से लोकप्रिय बनाएं.

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