आख़िर ये 251 रुपए का स्मार्टफ़ोन है कैसा?

Jun 29, 2016

जिसे दुनिया का सबसे सस्ता स्मार्टफ़ोन बताया जा रहा है, उसका आपके हाथ में आना इतना आसान नहीं है.

भारतीय कंपनी रिंगिंग बेल्स ने फरवरी में सबसे सस्ते स्मार्टफ़ोन फ्रीडम 251 को लांच किया था, जिसकी क़ीमत केवल 251 रुपए रखी गई थी.

लेकिन इसे ग्राहकों के हाथ तक पहुंचने में चार महीने का समय लग गया. कंपनी ने इसे दुनिया का सबसे सस्ता स्मार्टफ़ोन बताया है.

हाथ में लेने पर यह कुछ-कुछ ऐपल आईफ़ोन 5 की तरह का एहसास देता है.

इसकी क़ीमत के हिसाब से इसमें पाई जाने वाली विशेषताएं काफी प्रभावशाली हैं.

इस फ़ोन में आगे-पीछे दोनों तरफ कैमरे हैं. यह चार इंच (10.2 सेंटीमीटर) चौड़ा है. इसमें एक जीबी रैम है. इंटरनल स्टोरेज आठ जीबी है और एक्सपैंडेबल मेमोरी 32 जीबी तक है.

फ्रीडम 251 में क्वाड-कोर प्रोसेसर इस्तेमाल किया गया है, जो फ़ोन के ज्यादा इस्तेमाल होने की हालत में मदद करता है. जब फ़ोन का इस्तेमाल कम होता है तो बैटरी का कम इस्तेमाल करता है.

फ्रीडम 251 सफेद और काले रंग में उपलब्ध है.

कंपनी का कहना है कि इस फ़ोन का तैयार मॉडल सात जुलाई के बाद ही उपलब्ध हो पाएगा.

सवाल उठता है कि क्या कंपनी लाखों मोबाइल फ़ोन लोगों को मुहैया कराने में सक्षम है. कंपनी का दावा है कि वो ऐसा करने में सक्षम है.

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भारतीय जनता पार्टी के सांसद किरीट सोमैया ने फ़्रीडम 251 की योजना में ‘बड़ा घपला’ होने का आरोप लगाया था.

वहीं इंडियन सेलुलर एसोसियशन के मुखिया ने इसे ‘एक मज़ाक या एक घोटाला’ बताया था.

रिंगिंग बेल्स कंपनी के संस्थापक और मुख्य कार्यकारी मोहित गोयल इन आरोपों को ख़ारिज करते हैं.

उनका परिवार दशकों से सूखे मेवे का व्यापार करता रहा है.

वो कहते हैं, “मैं डिजिटल इंडिया सपने का हिस्सा बनना चाहता था. इसने मुझे सबसे सस्ते स्मार्टफ़ोन के आइडिया तक पहुंचा दिया.”

भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फ़ोन का बाज़ार है. यहां एक अरब मोबाइल यूजर्स हैं.

फरवरी में लांच होने के बाद फ्रीडम 251 खरीदने के लिए सात करोड़ से ज्यादा लोगों ने ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करवाया था. उस वक्त इस वजह से कंपनी की वेबसाइट क्रैश कर गई थी.

फरवरी में जब फ़ोन मुझे और दूसरे पत्रकारों को दिया गया, तो हमने पाया कि वो असल में चीन में बना हुआ फ़ोन था.

जब मैंने इसे चलाया तो यह एक बेसिक स्मार्टफ़ोन की तरह लगा. लेकिन इसकी क्षमताओं को पता करना एक मुश्किल काम था क्योंकि इसमें बहुत कम एप्लिकेशन थे.

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इसमें कैलकुलेटर, म्यूजिक प्लेयर, वेब ब्राउजर और ईमेल जैसी बहुत बुनियादी सुविधाएं थीं.

इसका ब्रांड नाम एडकॉम था जिसका सामने का हिस्सा सफेद पेंट करके छुपाया गया था. पीछे के हिस्से पर स्टिकर चिपका कर इसके नाम को छिपाया गया था.

इससे गुस्साए लोगों ने कंपनी के मुख्यालय के बाहर विरोध-प्रदर्शन किया था.

पुलिस, टैक्स अधिकारियों और प्रवर्तन निदेशालय की ओर ने इसकी जांच की घोषणा की थी.

रिंगिंग बेल्स ने तब लोगों के पैसे लौटा दिए थे, जो उसने इंटरनेंट के माध्यम से 30 हज़ार से ज्यादा लोगों से लिए थे.

अब जो नया मॉडल आया है, वो वाकई में अलग है. सबसे बड़ा बदलाव यह किया गया है कि इसमें डिस्पले के नीचे एक के बजाए तीन बटन हैं.

रिंगिंग बेल्स की अभी अपनी फैक्ट्री तक बननी बाकी है. तो फिर आख़िर ये फ़ोन बन कहां बन रहे हैं?

मोहित गोयल ने बताया, “कंपनी फिलहाल ताइवान से फ़ोन के कलपुर्जे मंगवा रही है. उत्तराखंड के हरिद्वार में उसे एसेंबल किया जा रहा है.”

वो कहते हैं कि एक बार उनके पास ठीक-ठाक पैसे आ जाएं तो वे भारत में ही फ़ोन के सारे कलपुर्जे बनाना चाहते हैं.

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ऐसे एक फ़ोन के निर्माण पर 1180 रुपए की लागत आती है. लेकिन रिंगिंग बेल्स टाई-अप के ज़रिए ऐप कंपनियों की मदद से फ़ोन को सब्सिडाइज़ करने का दावा करती है.

मोहित गोयल का कहना है कि उन्हें अब भी हर एक फ़ोन पर 150 रुपए का नुकसान है. वे सरकारी मदद की भी उम्मीद कर रहे हैं.

कहा जा रहा है कि करीब दो लाख हैंडसेट ग्राहकों को भेजने के लिए बनकर तैयार हैं.

फ़ोन के आने में अभी कुछ दिन और बचे हुए हैं. लेकिन आलोचक संतुष्ट नज़र नहीं आ रहे हैं.

तकनीकी मामलों पर लिखने वाले प्रणव दीक्षित का कहना है कि उन्हें नहीं लगता कि कंपनी जो वादा कर रही है, वो सब वह दे पाएगी.

दीक्षित कहते हैं, “मुझे मुश्किल लगता है कि किसी भी फ़ोन को 251 रुपए में बनाया जा सकता है. किसी भी चीज़ को बनाना एक महंगा काम होता है.”

वो कहते हैं कि सबसे अहम बात है कि इसे बनाने वालों के पास कोई तकनीकी बैकग्राउंड नहीं है.

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