10 करोड़ लोगों से टैक्स वसूलना कितना आसान?

Jun 17, 2016

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बंद दरवाजों के पीछे हुए ‘राजस्व ज्ञान संगम कार्यक्रम’ में आयकर अधिकारियों से आह्वान किया है कि वे आयकर दाताओं की संख्या जल्द से जल्द बढ़ाकर 10 करोड़ करने पर अपना सारा ध्यान केंद्रित करें जो अभी 5.3 करोड़ हैं.

मोदी ने यह भी कहा है कि ये लक्ष्य हासिल करना कठिन काम नहीं है, देश के कुल आयकर दाताओं में से 92 फीसद आयकर दाता स्वयं ही भुगतान कर देते हैं.

केवल आठ फीसदी कर दाताओं से आयकर एकत्र करने में अधिकारियों को मेहनत करनी पड़ती है.

इसके लिए अपनी आदत के अनुसार मोदी ने उन्हें गुरू मंत्र दिया- रैपिड यानी रेवन्यू (राजस्व) अकाउंटेबल (जवाबदेही) प्रोबिटी (सत्यनिष्ठा) इंफॉर्मेशन (सूचना) डिजिटाइजेशन.

मोदी की मान्यता है कि देश में ज़्यादातर लोग ईमानदार हैं, वे खुद ही टैक्स का भुगतान कर देंगे. वैसे ये हिमालयी लक्ष्य चील के घोंसले में मांस ढूंढने जैसा है, क्योंकि अधिकांश करदाता (केवल वेतन भोगियों को छोड़कर) कर चुराने में विश्वास करते हैं.

इसमें बड़े करदाता अधिक हैं जो अधिकांश आयकर राजस्व देते हैं. ताज़ा आंकड़ों के अनुसार लगभग पाँच करोड़ लोग आयकर रिटर्न दाख़िल करते हैं. इनमें कुछ भी आयकर नहीं देने वालों की संख्या तक़रीबन दो करोड़ है.

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इनमें से पांच लाख रुपए या उससे कम आय पर कर देने वालों की संख्या 1.2 करोड़ है. तमाम सरकारी-गैर सरकारी अध्ययनों से ये बात सामने आई है कि देश में जितने आयकर दाता हैं, उतने ही देश में टैक्स चोर हैं जिनकी आय करयुक्त सीमा से ज़्यादा है.

देश के सकल घरेलू उत्पाद में भारी वृद्धि होने के बाद भी आयकर दाताओं की संख्या में कोई उल्लेखनीय वृद्धि नहीं हुई है. बाकी देश में बीते सात वर्षों से कर-सकल घरेलू उत्पाद का अनुपात घटा है. वर्ष 2007-08 से यह अनुपात 11.8 फीसदी था, जो घटकर तक़रीबन 10 फीसदी रह गया है.

ध्यान देने वाली बात है कि इस दौरान निगम कर का भी अनुपात कम हुआ है. आज भी जो आदमी 22-24 हजार रुपए प्रति माह कमाता है, वह भी आयकर के घेरे में आ जाता है.

इससे अंदाज लगाया जा सकता है कि देश में कर चोरों की तादाद कितनी बड़ी होगी. देश के केवल वेतन भोगी ही मजबूरी में सबसे ईमानदारी से आयकर देते हैं.

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लेकिन छोटे कारोबारी, प्रोफेशनल वकील, डॉक्टर, सीए, कोचिंग शिक्षक आयकर विभाग को चकमा देने में कामयाब हो जाते हैं.

भारत में कृषि आय पर कोई कर नहीं लगता है. यह आयकर चुराने का सबसे बड़ा जुगाड़ है. क्या आपने कभी किसी हलवाई, पानवाले या पंसारी को आयकर देते सुना है जो हर मोहल्ले में पसरे हुए हैं.

हकीकत ये है कि देश में आर्थिक कानूनों के भय से लोग मुक्त हैं. आप विश्वास करें या न करें, वर्ष 2011 में 6.57 करदाताओं की कृषि आय लगभग 2000 लाख करोड़ रूपए थी. यानी देश के कुल घरेलू उत्पाद से 20 गुना ज्यादा थी फिर भी कर-सकल उत्पाद अनुपात कम बना हुआ है.

असल में धनिक कृषि आय दिखाकर कर देने से बचकर साफ निकल जाते हैं. मोदी कर संग्रह की वसूली का अह्वान करते तो कर संग्रह बढ़ने की उम्मीद ज्यादा हो जाती.

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मोदी के भय मुक्त कर प्रशासन के आह्वान से कर चोरों को और पनाह मिल जाएगी, यह उनको कोतवाल बनाने जैसा है, या कहें पहले से अधिक चांदी हो जाएगी.

विजय माल्या के मामले और बैंकों के बेतहाशा डूबते कर्ज बढ़ने से स्वतः जाहिर है कि बड़े कारोबारियों को क़ानून का कितना भय है.

मोदी के कर वसूली बढ़ाने के अह्वान से कर-सकल घरेलू अनुपात सुधारने में ज़्यादा मदद मिलती और सामाजिक कल्याण की योजनाएं चलाने में सरकार को ज़्यादा राजस्व हासिल होता.

अभी सामाजिक कल्याण की योजनाएं चलाने में सरकार को बजट घाटे का सहारा कम से कम लेना पड़ता.

ध्यान देने वाली बात है कि विकासशील देशों जैसे चीन, ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका में कर-सकल घरेलू उत्पाद अनुपात सबसे कम है, लगभग इन देशों का आधा. ये तथ्य भी किसी से छिपा नहीं है कि इसका बड़ा कारण देश में कर चोरी है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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