लाभ का पदः ‘केजरीवाल के पास अब एक ही रास्ता’

Jun 16, 2016

दिल्ली की आम आदमी पार्टी सरकार अपने 21 विधायकों को संसदीय सचिव बनाने के फ़ैसले पर चारों ओर से घिर गई लगती है.

इन पदों को ‘लाभ से अलग रखने’ को लेकर विधानसभा में रेट्रोस्पेक्टिव बिल (यानी जो पिछली तारीख से लागू होगा) पारित किया गया था.

लेकिन राष्ट्रपति की ओर से इसे ख़ारिज किए जाने के बाद, इन विधायकों पर डिस्क्वालिफ़ाई किए जाने का ख़तरा मंडरा रहा है.

हालांकि आम आदमी पार्टी और केजरीवाल दूसरे प्रदेशों की सरकारों की ओर से इसी तरह की नियुक्तियों का हवाला दे रहे हैं.

लेकिन विपक्षी दल और इस मामले में चुनाव आयोग के पास गए याचिकाकर्ता ने कहा है कि दिल्ली सरकार के पास अब कोई रास्ता नहीं बचा है.

तो क्या अरविंद केजरीवाल के पास अब कोई विकल्प नहीं बचा?

संविधान के विशेषज्ञ मानते हैं कि केजरीवाल के पास एक रास्ता बचा है और वो है अदालत जाने का…

वरिष्ठ वकील राजीव धवन का कहना है कि आम आदमी पार्टी के पास अपने विधायकों की सदस्यता बचाने के लिए अब केवल कोर्ट का रास्ता ही बचा है.

बीबीसी से खास बातचीत में उन्होंने कहा, “पार्टी के केंद्र सरकार से संबंध ठीक नहीं हैं और सरकार भी उन पर कोई रहम नहीं करेगी. लेकिन फिलहाल विधायकों की सदस्यता ख़त्म करने में समय लगेगा.”

राजीव धवन का कहना है, “आप के पास समय है कि वो अच्छी तरह से तैयारी करे कि किस आधार पर अपने विधायकों का बचाव कर सकती है. उसके बाद वह अपनी बात को रखने के लिए सुप्रीम कोर्ट जा सकती है.”

उनका मानना है कि कोई आदमी ग़लती कर देता है तो उसे छिपाने की कोशिश करता है. उनके मुताबिक, “आम आदमी पार्टी को लगा कि उसने ग़लती कर दी है, इसलिए बाद में दिल्ली सरकार ने विधानसभा में बिल पास करके राष्ट्रपति के पास भेजा दिया. अब राष्ट्रपित ने कुछ सोच समझकर ही उसे वापस किया होगा.”

धवन कहते हैं, “ये संसदीय सचिव भले ही सैलरी नहीं ले रहे हैं, लेकिन ऑफ़िस का इस्तेमाल तो कर ही रहे हैं.”

उधर, इस लाभ के पद के मामले में चुनाव आयोग से शिकायत करने वाले वकील प्रशांत पटेल का कहना है कि ऐसे मामले पहले भी हुए हैं.

उन्होंने बीबीसी को बताया, “पहले भी इस वजह से कई विधायकों और सांसदों को अपनी सदस्यता गंवानी पड़ी हैं. लाभ के पद का मतलब केवल ये नहीं है कि आप सैलरी ले रहे हैं या नहीं. आप ऑफ़िस ले रहे हैं, तो यह भी उस परिभाषा में आता है.”

उन्होंने बीजेपी से अपने किसी भी तरह के संबंध होने के आरोपों से इंकार किया है.

उनका दावा है, “इस पूरे मामले में कहीं भी केंद्र सरकार शामिल नहीं है. यह चुनाव आयोग और राष्ट्रपति के बीच का मामला है.”

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