‘फ़िल्मों में गालियों का इस्तेमाल नहीं करता मैं’

Jun 14, 2016

कभी आपने अपने परिवार के साथ ऐसी कोई फ़िल्म देखी है जिसमें अचानक बिना चेतावनी दिए भारी अश्लील गाली-गलौज शुरू हो जाती है और आप अपनी सीट पर बेचैनी से पहलू बदलते रह जाते हैं?

फ़िल्म ‘उड़ता पंजाब’ पर उठे विवाद के साथ ही इस बात पर भी चर्चा होने लगी है कि आम जनता के लिए रिलीज़ की जाने वाली फ़िल्मों की भाषा कैसी हो.

बीबीसी हिंदी के रेडियो कार्यक्रम इंडिया बोल में शामिल हुए निर्देशक तिग्मांशु धूलिया का कहना है, “अँधेरे हॉल में आपके परिवार के लोग बगल में बैठे हों और फ़िल्म में गालियाँ आने लगें तो बेचैनी तो हो ही जाती है.”

पान सिंह तोमर और साहब-बीबी और गैंग्स्टर जैसी फ़िल्मों के निर्देशक धूलिया ने बीबीीसी से कहा, “मैंने अपनी पहली फ़िल्म हासिल बनाई थी जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में सेट थी. मैं वहाँ कैसी भी भाषा का इस्तेमाल कर सकता था लेकिन मैं फ़िल्म में गालियों का इस्तेमाल नहीं करता. पान सिंह तोमर को डकैतों पर थी पर उसमें एक भी गाली नहीं थी.”

मगर आपने अनुराग कश्यप की फ़िल्म गैंग्स ऑफ़ वासेपुर में जिस रामाधीन सिंह को देखा था उनके मुँह से छूटते ही गंदी गंदी गालियाँ निकलती हैं और ये किरदार तिग्मांशु धूलिया ने ही निभाया था.

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हालाँकि धूलिया का कहना साफ़ है कि मैं अपनी फ़िल्मों में गालियों का इस्तेमाल नहीं करता पर अगर कोई दूसर डाइरेक्टर अपनी फ़िल्म में गालियाँ रखता है ये उसका पर्सनल मामला है मुझे उससे कोई ऐतराज़ नहीं है.

धूलिया ने कहा कि फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड का ये काम नहीं है कि वो बताए कि काटछांट कहां कहां की जाए. उनका काम है प्रमाणपत्र देना.

इस फ़िल्म के निर्माता अनुराग कश्यप के अनुसार, बोर्ड ने उनसे फ़िल्म में 89 कट लगाने को कहा था, जिनमें पंजाब, एमपी, एमएल और जगहों के नाम भी शामिल थे.

फ़िल्मों के दृश्यों और अन्य पहलुओं पर सेंसर लगाने के बारे में तिग्मांशु धूलिया का कहना है कि फ़िल्म में क्या दिखाना है, क्या पहनना है, क्या रहन सहन हो उसे बताने का काम बोर्ड का नहीं है.

उन्होंने कहा, “हमारे डायरेक्टर इतने समझदार तो होते हैं कि वो समाज के संतुलन को समझें और फ़िल्म बनाएं. हमारे देश में भी समझदार और पढ़े लिखे लोग हैं.”

इस विवाद के कोर्ट तक पहुंचे पर उनका कहना था, “अच्छा हुआ कि ये बात कोर्ट तक पहुंची. इस फ़िल्म ने एक आवाज़ उठाई और कोर्ट ने भी पक्ष में फ़ैसला सुनाया. इसकी मुझे बहुत ख़ुशी है.”

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लेकिन कई लोग ये सवाल उठाते हैं कि समाज में सभ्यता का मानदंड बनाए रखना भी उतना ही ज़रूरी है, आख़िर ये कौन करेगा?

इस पर तिग्मांशु धूलिया कहते हैं, “भारतीय समाज अन्य देशों से थोड़ा अलग है. अलग अलग संस्कृति और अलग अलग भाषाएं हैं. मान लीजिए हमने किसी फ़िल्म को सर्टिफ़िकेट दे दिया और लेकिन अगर फ़िल्म में कोई ऐसी बात है जिससे किसी सम्प्रदाय की भावनाएं आहत हों तो उसका ज़िम्मेवार कौन होगा?”

वो कहते हैं, “लेकिन फ़िल्म से किसी तरह के साम्प्रदायिक तनाव जैसी बात न हो इसके लिए कोई तंत्र तो होना ही चाहिए.”

उनके अनुसार, सिनेमा समाज का प्रतिबिंब होता है और वो वहीं से अपने कथ्य उठाता है. लोगों का रहन सहन, बोल चाल, संस्कृति सिनेमा ये सब समाज से ही लेता है.

हालांकि कई लोगों का मानना है कि सिनेमा में हिंसा से समाज में अपराध बढ़ रहा है, बल्कि इसका बच्चों पर बुरा असर पड़ रहा है.

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इस बात को तिग्मांशु धूलिया स्वीकार करते हैं लेकिन वो कहते हैं कि समाज में हिंसा की अन्य वजहें ज़्यादा अहम हैं, जैसे ग़रीबी, ग़ैरबराबरी, नशा आदि.

सेंसर बोर्ड की भूमिका पर वो कहते हैं, “दोनों बातें होनी चाहिए. एक तो फ़िल्म को प्रमाणपत्र दिए जाने चाहिए ताकि ये सुनिश्चित हो सके कि किस उम्र के लोगों के लिये ये उपयुक्त है. दूसरे, ऐसी फ़िल्में जो तनाव पैदा करें उसके लिए एक नीति बननी चाहिए.”

उनका कहना है कि आप सेंसरशिप से कितना बचेंगे. इंटरनेट पर तो सेंसरशिप नहीं है और वहां हर चीज़ मौजूद है.

हालांकि उड़ता पंजाब के सह निर्माता अनुराग कश्यप ने इस विवाद पर कहा था किसी फ़िल्म के भविष्य का फ़ैसला सिर्फ दर्शकों के हाथ में होना चाहिए जबकि बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी ने फ़िल्म में कट लगाए जाने को उचित ठहराया था.

अब हाईकोर्ट का फ़ैसला आ गया है, ऐसे में फ़िल्म के अपने समय पर रिलीज़ होने की उम्मीद बढ़ गई है.

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